यह पाठ आधुनिक संस्कृत कवि हरिदत्त शर्मा की रचना ‘लसल्लतिका’ से लिया गया है। इसमें कवि ने महानगरों में बढ़ते प्रदूषण, प्रकृति से दूरी, और शुद्ध पर्यावरण की आवश्यकता पर चिंता व्यक्त की है।

श्लोक 1
दुर्वहमत्र जीवितं जातं प्रकृतिरेव शरणम्। शुचि-पर्यावरणम्॥
👉 हिंदी अनुवाद: यहाँ जीवन कठिन हो गया है। अब केवल प्रकृति ही हमारी शरण है। शुद्ध पर्यावरण ही समाधान है।
श्लोक 2
महानगरमध्ये चलदनिशं कालायसचक्रम्। मनः शोषयत् तनुः पेषयद् भ्रमति सदा वक्रम्॥
👉 हिंदी अनुवाद: महानगरों में दिन-रात चलता हुआ लोहे का चक्का मन को सुखाता है, शरीर को पीसता है और हमेशा टेढ़ा घूमता है।
श्लोक 3
कज्जलमलिनं धूमं मुञ्चति शतशकटीयानम्। वाष्पयानमाला संधावति वितरन्ती ध्वानम्॥
👉 हिंदी अनुवाद: सैकड़ों मोटरगाड़ियाँ काजल जैसे काले धुएँ को छोड़ती हैं। रेलगाड़ियों की पंक्तियाँ शोर करती हुई दौड़ती हैं।
श्लोक 4
वायुमण्डलं भृशं दूषितं न हि निर्मलं जलम्। कुत्सितवस्तुमिश्रितं भक्ष्यं समलं धरातलम्॥
👉 हिंदी अनुवाद: वायुमंडल अत्यधिक दूषित हो गया है। जल शुद्ध नहीं है। भोजन भी अशुद्ध वस्तुओं से मिला हुआ है। धरती भी मैली हो चुकी है।
श्लोक 5
करणीयं बहिरन्तर्जगति तु बहु शुद्धीकरणम्। शुचि-पर्यावरणम्॥
👉 हिंदी अनुवाद: बाहरी और आंतरिक जगत में बहुत अधिक शुद्धीकरण करना आवश्यक है। शुद्ध पर्यावरण ही एकमात्र आश्रय है।
🧾 श्लोक 6
कञ्चित् कालं नय मामस्मान्नगराद् बहुदूरम्। प्रपश्यामि ग्रामान्ते निर्झर-नदी-पयःपूरम्॥
👉 हिंदी अनुवाद: कुछ समय के लिए मुझे इस नगर से बहुत दूर ले चलो। मैं गाँव के किनारे झरने, नदी और तालाब देखना चाहता हूँ।
🧾 श्लोक 7
एकान्ते कान्तारे क्षणमपि मे स्यात् सञ्चरणम्। शुचि-पर्यावरणम्॥
👉 हिंदी अनुवाद: एकांत वन में मुझे कुछ क्षण के लिए भी भ्रमण करने का अवसर मिले। शुद्ध पर्यावरण ही समाधान है।
श्लोक 8
हरिततरूणां ललितलतानां माला रमणीया। कुसुमावलिः समीरचालिता स्यान्मे वरणीया॥
👉 हिंदी अनुवाद: हरे-भरे वृक्षों और सुंदर लताओं की माला, हवा से हिलती हुई फूलों की पंक्ति मेरे लिए चुनने योग्य हो।
श्लोक 9
नवमालिका रसालं मिलिता रुचिरं संगमनम्। शुचि-पर्यावरणम्॥
👉 हिंदी अनुवाद: नई चमेली की बेल और आम के वृक्ष का सुंदर संगम हो। यही शुद्ध पर्यावरण है।
श्लोक 10
अयि चल बन्धो! खगकुलकलरव गुञ्जितवनदेशम्। पुर-कलरव सम्भ्रमितजनेभ्यो धृतसुखसन्देशम्॥
👉 हिंदी अनुवाद: हे मित्र! पक्षियों की चहचहाहट से गूंजते वन प्रदेश में चलो। शहर के शोर से भ्रमित लोगों को सुख का संदेश दो।
श्लोक 11
चाकचिक्यजालं नो कुर्याज्जीवितरसहरणम्। शुचि-पर्यावरणम्॥
👉 हिंदी अनुवाद: चमक-दमक वाली दुनिया हमारे जीवन के आनंद को न छीन ले। शुद्ध पर्यावरण ही जीवन का रस है।
🧾 श्लोक 12
प्रस्तरतले लतातरुगुल्मा नो भवन्तु पिष्टाः। पाषाणी सभ्यता निसर्गे स्यान्न समाविष्टा॥
👉 हिंदी अनुवाद: पत्थरों के नीचे लताएँ, वृक्ष और झाड़ियाँ न कुचली जाएँ। पत्थर जैसी सभ्यता प्रकृति में शामिल न हो।
श्लोक 13
मानवाय जीवनं कामये नो जीवन्मरणम्। शुचि-पर्यावरणम्॥
👉 हिंदी अनुवाद: मैं मनुष्य के लिए जीवन की कामना करता हूँ, जीते हुए मृत्यु की नहीं। शुद्ध पर्यावरण ही जीवन है।
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निष्कर्ष
यह पाठ हमें सिखाता है कि प्रकृति ही जीवन का आधार है। महानगरों की भागदौड़ और प्रदूषण से दूर रहकर हमें शुद्ध पर्यावरण की ओर लौटना चाहिए। यही जीवन को सुखद और संतुलित बनाता है।



