कक्षा 10 संस्कृत – पाठ 1: शुचिपर्यावरणम् (हिंदी अनुवाद)
कक्षा 10 संस्कृत – पाठ 1: शुचिपर्यावरणम् (हिंदी अनुवाद)
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कक्षा 10 संस्कृत – पाठ 1: शुचिपर्यावरणम् (हिंदी अनुवाद)

by | Jul 14, 2025 | 0 comments

यह पाठ आधुनिक संस्कृत कवि हरिदत्त शर्मा की रचना ‘लसल्लतिका’ से लिया गया है। इसमें कवि ने महानगरों में बढ़ते प्रदूषण, प्रकृति से दूरी, और शुद्ध पर्यावरण की आवश्यकता पर चिंता व्यक्त की है।

संस्कृत:
दुर्वहमत्र जीवितं जातं प्रकृतिरेव शरणम्।
शुचि-पर्यावरणम्॥
महानगरमध्ये चलदनिशं कालायसचक्रम्।
मनः शोषयत् तनूं पेषयद् भ्रमति सदा वक्रम्॥
दुर्दैवैस्तैः शनैः शनैर्मुनैव स्यात् जनग्रसनम्। शुचि॥

हिंदी अनुवाद:
यहाँ (इस संसार में) जीवन जीना अत्यंत कठिन (दुर्वह) हो गया है, अब तो प्रकृति ही एकमात्र शरण रह गई है — पर्यावरण पवित्र हो!
महानगर के बीचोंबीच दिन-रात निरंतर लोहे का चक्र (यंत्रों/मशीनों का जाल) चलता रहता है।
यह मन को सुखा देता है, शरीर को पीस डालता है और सदा टेढ़े-मेढ़े ढंग से घूमता रहता है।
इन दुर्भाग्यों के कारण धीरे-धीरे मानो मनुष्यों का ही ग्रसन (निगल लिया जाना/विनाश) हो रहा है। पर्यावरण पवित्र हो!

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संस्कृत:
कज्जलमलिनं धूमं मुञ्चति शतशकटीयानम्।
वाष्पयानमाला संधावति वितरन्ती ध्वानम्॥
यानानां पङ्क्तयो हन्तारः कठिनं संसरणम्। शुचि॥

हिंदी अनुवाद:
काजल के समान काला धुआँ सैकड़ों वाहन/गाड़ियाँ छोड़ती हैं।
रेलगाड़ियों की कतार शोर मचाती हुई (ध्वनि फैलाती हुई) दौड़ती चली जाती है।
वाहनों की पंक्तियाँ मानो घातक बन गई हैं, आवागमन बहुत कठिन हो गया है। पर्यावरण पवित्र हो!

संस्कृत:
वायुमण्डलं भृशं दूषितं न हि निर्मलं जलम्।
कुत्सितवस्तुभिश्च सकलं भक्ष्यं समलं धरातलम्॥
करणीयं बहिरन्तर्गतं तु बहु शुद्धीकरणम्। शुचि॥

कञ्चित् कालं नय मां स्थानगृहात् बहुदूरम्।
प्रपश्यामि ग्रामान्ते निर्झर-नदी-पयःपूरम्॥
एकान्ते कान्तारं क्षणमपि मे स्यात् सञ्चरणम्। शुचि॥

हरिततरूणां ललितलतानां माला रमणीया।
कुसुमावलिः समीरचालिता स्यान्मे वरणीया॥
नवमालिका रसाला मिलितं रुचिरं संगमनम्। शुचि॥

हिंदी अनुवाद:
वायुमण्डल अत्यंत दूषित हो गया है, जल भी निर्मल नहीं रहा।
गंदी वस्तुओं से मिश्रित यह सारा भक्ष्य पदार्थ (भोजन) और धरातल मैला हो गया है।
बाहर और भीतर — दोनों ओर बहुत शुद्धिकरण करना आवश्यक है। पर्यावरण पवित्र हो!

कुछ समय के लिए मुझे इस घर/स्थान से बहुत दूर ले चलो।
मैं गाँव के छोर पर झरनों और नदी के भरपूर जल को देखना चाहता हूँ।
एकांत वन में मुझे क्षणभर के लिए भी विचरण करने का अवसर मिले। पर्यावरण पवित्र हो!

हरे-भरे वृक्षों की सुंदर लताओं की माला मन को मोहित करती है।
हवा से हिलती-डुलती फूलों की माला मुझे बहुत प्रिय हो।
नवमालिका और रसीला आम — इनका सुंदर मिलन हो। पर्यावरण पवित्र हो!

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संस्कृत:
अयि चल बन्धो! खगकुलकलरवगुञ्जितवनदेशम्।
पुर-कलरवसम्भ्रमितजनेभ्यो धृतसुखसन्देशम्॥
चाकचिक्ययुगलं नो कुर्याज्जीवितसंहरणम्। शुचि॥

प्रस्तरतले लतातरुगुल्मा नो भवन्तु पिष्टाः।
पाषाणी सभ्यता निसर्गे स्यान्न समाविष्टा॥
मानवाय जीवनं कामये नो जीवन्मरणम्। शुचि॥७॥

हिंदी अनुवाद:
अरे मित्र, चलो चलें उस वन-प्रदेश की ओर, जो पक्षियों के समूह के कलरव से गूंज रहा है।
जो नगर के शोरगुल से घबराए हुए लोगों के लिए सुख का संदेश धारण किए हुए है।
चमक-दमक (कृत्रिम आडंबर) की यह जोड़ी हमारे जीवन का हरण न करे। पर्यावरण पवित्र हो!

पत्थरों के नीचे लताएँ, वृक्ष और झाड़ियाँ कुचली न जाएँ।
पत्थर/कंक्रीट की सभ्यता प्रकृति में सम्मिलित न हो।
मैं मनुष्य के लिए (सच्चा) जीवन चाहता हूँ, जीते-जी मरने जैसा जीवन नहीं। पर्यावरण पवित्र हो!

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निष्कर्ष | पाठ 1: शुचिपर्यावरणम्

यह पाठ हमें सिखाता है कि प्रकृति ही जीवन का आधार है। महानगरों की भागदौड़ और प्रदूषण से दूर रहकर हमें शुद्ध पर्यावरण की ओर लौटना चाहिए। यही जीवन को सुखद और संतुलित बनाता है।

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