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Class 10 Sanskrit Chapter 6 Hindi Translation

by | Jul 19, 2025 | 0 comments

परिचय – सौहार्दं प्रकृतेः शोभा

षष्ठः पाठः — सौहार्दं प्रकृतेः शोभा (शेमुषी भाग-2, कक्षा 10) — सम्पूर्ण पाठ का हिन्दी अनुवाद

पाठ-परिचय

यह पाठ बताता है कि आपसी व्यवहार स्नेह और सौहार्द से युक्त होना चाहिए। आज समाज में लोग आत्माभिमानी होकर एक-दूसरे का तिरस्कार करते हैं। इस नाट्य-रूप पाठ में पशु-पक्षियों के माध्यम से यह सन्देश दिया गया है कि समाज में सबका अपना-अपना महत्त्व है और सभी एक-दूसरे पर आश्रित हैं।

मूल पाठ एवं हिन्दी अनुवाद

मूल: अयं पाठः परस्परं स्नेहसौहार्दपूर्णः व्यवहारः स्यादिति बोधयति। सम्प्रति वयं पश्याम: यत् समाजे जनाः आत्माभिमानिनः सञ्जाताः, ते परस्परं तिरस्कुर्वन्ति।

हिन्दी अर्थ: यह पाठ बताता है कि आपस में स्नेह और सौहार्दपूर्ण व्यवहार होना चाहिए। आज हम देखते हैं कि समाज में लोग अहंकारी हो गए हैं, वे आपस में एक-दूसरे का तिरस्कार करते हैं।

मूल: स्वार्थपूरणे संलग्नाः ते परेषां कल्याणविषये नैव किमपि चिन्तयन्ति। तेषां जीवनोद्देश्यम् अधुना इदं सञ्जातम् — ‘नीचैरनीचैरतिनीचनीचैः सर्वैः उपायैः फलमेव साध्यम्।’

हिन्दी अर्थ: स्वार्थ-पूर्ति में लगे हुए वे दूसरों के कल्याण के विषय में कुछ भी नहीं सोचते। उनके जीवन का उद्देश्य अब यह हो गया है — ‘नीच, अनीच, अति नीच — किसी भी तरह के उपायों से बस फल (लाभ) प्राप्त करना है।’

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मूल: अतः समाजे पारस्परिकस्नेहसंवर्धनाय अस्मिन् पाठे पशुपक्षिणां माध्यमेन समाजे व्यवहृतम् आत्माभिमानं दर्शयन्, प्रकृतिमातुः माध्यमेन अन्ते निष्कर्षः स्थापितः यत् कालानुगुणं सर्वेषां महत्त्वं भवति, सर्वे अन्योन्याश्रिताः सन्ति।

हिन्दी अर्थ: इसलिए समाज में परस्पर स्नेह बढ़ाने के लिए इस पाठ में पशु-पक्षियों के माध्यम से समाज में व्याप्त अहंकार को दिखाते हुए, प्रकृति माता के माध्यम से अन्त में यह निष्कर्ष स्थापित किया गया है कि समय के अनुसार सभी का महत्त्व होता है, सभी एक-दूसरे पर आश्रित हैं।

मूल: अतः अस्माभिः स्वकल्याणाय परस्परं स्नेहेन मैत्रीपूर्णव्यवहारेण च भाव्यम्।

हिन्दी अर्थ: इसलिए हमें अपने कल्याण के लिए आपस में स्नेह और मित्रतापूर्ण व्यवहार से रहना चाहिए।

मूल: वनस्य दृश्यं समीपे एवैका नदी वहति। एकः सिंहः सुखेन विश्राम्यति, तदैव एकः वानरः आगत्य तस्य पुच्छं धुनाति।

हिन्दी अर्थ: वन का दृश्य है, पास ही एक नदी बहती है। एक सिंह आराम से विश्राम कर रहा है, तभी एक वानर आकर उसकी पूँछ पकड़कर घुमा देता है।

मूल: क्रुद्धः सिंहः तं प्रहर्तुमिच्छति परं वानरस्तु कूर्दित्वा वृक्षमारूढः। तदैव अन्यस्मात् वृक्षात् अपरः वानरः सिंहस्य कर्णमाकृष्य पुनः वृक्षोपरि आरोहति।

हिन्दी अर्थ: क्रोधित सिंह उसे मारना चाहता है, पर वानर कूदकर पेड़ पर चढ़ जाता है। तभी दूसरे पेड़ से एक और वानर सिंह का कान खींचकर फिर पेड़ पर चढ़ जाता है।

मूल: एवमेव वानराः वारं वारं सिंहं तुदन्ति। क्रुद्धः सिंहः इतस्ततः धावति, गर्जति परं किमपि कर्तुमसमर्थः एव तिष्ठति।

हिन्दी अर्थ: इस तरह वानर बार-बार सिंह को तंग करते हैं। क्रोधित सिंह इधर-उधर दौड़ता है, गरजता है, परन्तु कुछ भी करने में असमर्थ ही रहता है।

मूल: वानराः हसन्ति वृक्षोपरि च विविधाः पक्षिणः अपि सिंहस्य एतादृशीं दशां दृष्ट्वा हर्षमिश्रं कलरवं कुर्वन्ति।

हिन्दी अर्थ: वानर हँसते हैं, और पेड़ पर बैठे विविध पक्षी भी सिंह की ऐसी दशा देखकर प्रसन्नतापूर्वक चहचहाने लगते हैं।

मूल: निद्राभङ्गदुःखेन वनराजः सन्नपि तुच्छजीवैः आत्मनः एतादृश्या दुरवस्थया श्रान्तः सर्वजन्तून् दृष्ट्वा पृच्छति —

हिन्दी अर्थ: नींद टूटने के दुख से वनराज (सिंह), होते हुए भी तुच्छ जीवों (वानरों) के कारण अपनी ऐसी दुर्दशा से थका हुआ, सब प्राणियों को देखकर पूछता है —

सिंहः: (क्रोधेन गर्जन्) भोः! अहं वनराजः, किं भयं न जायते? किमर्थं मामेवं तुदन्ति सर्वे मिलित्वा?

हिन्दी अर्थ: (क्रोध से गरजते हुए) अरे! मैं वनराज हूँ, क्या तुम्हें भय नहीं होता? सब मिलकर मुझे ही क्यों तंग करते हो?

एकः वानरः: यतः त्वं वनराजः भवितुं तु सर्वथाऽयोग्यः। राजा तु रक्षकः भवति परं भवान् तु भक्षकः। अपि च स्वरक्षायामपि समर्थः नासि, तर्हि कथमस्मान् रक्षिष्यसि?

हिन्दी अर्थ: क्योंकि तुम वनराज बनने के सर्वथा अयोग्य हो। राजा तो रक्षक होता है, परन्तु आप तो भक्षक हैं। और जब आप स्वयं की रक्षा करने में भी समर्थ नहीं हैं, तो हमारी रक्षा कैसे करेंगे?

अन्यः वानरः: किं न श्रुता त्वया पञ्चतन्त्रोक्तिः —

हिन्दी अर्थ: क्या तुमने पंचतन्त्र की यह उक्ति नहीं सुनी —

यो न रक्षति वित्रस्तान् पीड्यमाना परैः सदा।
जन्तून् पार्थिवरूपेण स कृतान्तो न संशयः॥

हिन्दी अर्थ: जो राजा सदा दूसरों से पीड़ित और भयभीत प्राणियों की रक्षा नहीं करता, वह राजा के रूप में निश्चय ही यमराज (मृत्यु) है।

काकः: आम् सत्यं कथितं त्वया— वस्तुतः वनराजः भवितुं तु अहमेव योग्यः।

हिन्दी अर्थ: हाँ, तुमने सत्य कहा — वास्तव में वनराज बनने के योग्य तो मैं ही हूँ।

पिकः: (उपहसन्) कथं त्वं योग्यः वनराजः भवितुं, यत्र तत्र का-का इति कर्कशध्वनिना वातावरणमाकुलीकरोषि। न रूपम्, न ध्वनिरस्ति। कृष्णवर्णम् मेध्यामेध्यभक्षकं त्वां कथं वनराजं मन्यामहे वयम्?

हिन्दी अर्थ: (हँसते हुए) तुम वनराज बनने योग्य कैसे हो, जो जहाँ-तहाँ कर्कश ‘का-का’ ध्वनि से वातावरण को व्याकुल करते हो। न तुम्हारा रूप है, न मीठी ध्वनि। काले रंग वाले, अच्छा-बुरा दोनों खाने वाले तुम्हें हम वनराज कैसे मानें?

काकः: अरे! अरे! किं जल्पसि? यदि अहं कृष्णवर्णः तर्हि त्वं किं गौराङ्गः? अपि च विस्मर्यते किं यत् मम सत्यप्रियता तु जनानां कृते उदाहरणस्वरूपा — ‘अनृतं वदसि चेत् काकः दशेत्’ — इति प्रकारेण। अस्माकं परिश्रमः ऐक्यं च विश्वप्रथितम्। अपि च काकचेष्टः विद्यार्थी एव आदर्शच्छात्रः मन्यते।

हिन्दी अर्थ: अरे! अरे! क्या बकवास कर रहे हो? यदि मैं काला हूँ तो क्या तुम गोरे हो? और क्या तुम भूल जाते हो कि मेरी सच्चाई तो लोगों के लिए ‘यदि झूठ बोलोगे तो कौआ काट लेगा’ — इस तरह उदाहरण बन चुकी है। हमारा परिश्रम और एकता विश्वप्रसिद्ध है। और काक जैसी सतर्कता रखने वाला विद्यार्थी ही आदर्श छात्र माना जाता है।

पिकः: अलम् अलम् अतिविकत्थनेन। किं विस्मर्यते यत्—

हिन्दी अर्थ: बस, बस, इतनी डींगें मत मारो। क्या तुम भूल जाते हो कि —

काकः कृष्णः पिकः कृष्णः को भेदः पिककाकयोः।
वसन्तसमये प्राप्ते काकः काकः पिकः पिकः॥

हिन्दी अर्थ: कौआ काला है, कोयल भी काली है — दोनों में क्या अन्तर है? वसन्त ऋतु आने पर पता चल जाता है कि कौआ कौआ है और कोयल कोयल है।

काकः: रे परभृत्! अहं यदि तव संततिं न पालयामि तर्हि कुत्र स्युः पिकाः? अतः अहम् एव करुणापरः पक्षिसम्राट् काकः।

हिन्दी अर्थ: अरे कोयल! यदि मैं तुम्हारी सन्तान का पालन न करूँ, तो कोयलें कहाँ रहेंगी? इसलिए मैं ही दयालु पक्षी-सम्राट कौआ हूँ।

गजः: समीपतः एवागच्छन् अरे! अरे! सर्वं सम्भाषणं शृण्वन्नेवाहम् अत्रागच्छम्। अहं विशालकायः, बलशाली, पराक्रमी च। सिंहः वा स्यात् अथवा अन्यः कोऽपि, वन्यपशून् तु तुदन्तं जन्तुमहं स्वशुण्डेन पोथयित्वा मारयिष्यामि। किमन्यः कोऽप्यस्ति एतादृशः पराक्रमी। अतः अहमेव योग्यः वनराजपदाय।

हिन्दी अर्थ: पास आते हुए अरे! अरे! तुम्हारी सारी बातचीत सुनते हुए ही मैं यहाँ आया हूँ। मैं विशालकाय, बलशाली और पराक्रमी हूँ। चाहे सिंह हो या कोई और, जो भी वन्य पशुओं को सताएगा, उसे मैं अपनी सूँड से पीटकर मार डालूँगा। क्या कोई और भी ऐसा पराक्रमी है? इसलिए वनराज पद के लिए मैं ही योग्य हूँ।

(वानर शीघ्रमेव गजस्यापि पुच्छं विधूय वृक्षोपरि आरोहति। गजः तं वृक्षमेव शुण्डेन आलोडयितुमिच्छति परं वानरस्तु कूर्दित्वा अन्यं वृक्षमारोहति। सिंह भी यह देखकर हँसता है।)

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सिंहः: भोः गज! माम्प्येवमेवातुदन् एते वानराः।

हिन्दी अर्थ: अरे हाथी! मुझे भी इन वानरों ने इसी तरह तंग किया था।

वानरः: एतस्मादेव तु कथयामि यदहमेव योग्यः वनराजपदाय येन विशालकायं पराक्रमिणं, भयंकरं चापि सिंहं गजं वा पराजेतुं समर्था अस्माकं जातिः। अतः वन्यजन्तूनां रक्षायै वयमेव क्षमाः।

हिन्दी अर्थ: इसीलिए तो मैं कहता हूँ कि वनराज पद के लिए मैं ही योग्य हूँ, क्योंकि हमारी जाति विशालकाय, पराक्रमी और भयंकर सिंह या हाथी को भी हरा सकती है। इसलिए वन्य प्राणियों की रक्षा के लिए हम ही समर्थ हैं।

(इसी समय बाघ और चीता भी नदी का जल पीने आते हैं, वे यह विवाद सुनते हैं और बोलते हैं।)

व्याघ्रचित्रकौ: अरे किं वनराजपदाय सुपात्रं चीयते? एतदर्थं तु आवामेव योग्यौ। यस्य कस्यापि चयनं कुर्वन्तु सर्वसम्मत्या।

हिन्दी अर्थ: अरे, क्या वनराज पद के लिए योग्य पात्र चुना जा रहा है? इसके लिए तो हम दोनों ही योग्य हैं। सबकी सम्मति से जिस किसी को भी चुन लें।

सिंहः: तूष्णीं भव भोः। युवामपि मत्सदृशौ भक्षकौ न तु रक्षकौ। एते वन्यजीवाः भक्षकं रक्षकपदयोग्यं न मन्यन्ते अत एव विचारविमर्शः प्रचलति।

हिन्दी अर्थ: चुप रहो। तुम दोनों भी मेरी तरह भक्षक हो, रक्षक नहीं। ये वन्य प्राणी भक्षक को रक्षक पद के योग्य नहीं मानते, इसीलिए यह विचार-विमर्श चल रहा है।

बकः: सर्वथा सम्यगुक्तम् सिंहमहोदयेन। वस्तुतः एव सिंहेन बहुकालपर्यन्तं शासनं कृतम् परमधुना तु कोऽपि पक्षी एव राजेति निश्चेतव्यम् अत्र तु संशीतिलेशस्यापि अवकाशः एव नास्ति।

हिन्दी अर्थ: सिंह महोदय ने सर्वथा उचित कहा। वास्तव में अब तक सिंह ने ही शासन किया है, परन्तु अब तो कोई पक्षी ही राजा होना चाहिए — इसमें ज़रा भी सन्देह की गुंजाइश नहीं है।

सर्वे पक्षिणः: (उच्चैः) आम् आम्— कश्चित् खगः एव वनराजः भविष्यति इति।

हिन्दी अर्थ: (ऊँचे स्वर से) हाँ हाँ — कोई पक्षी ही वनराज बनेगा।

(परन्तु कोई भी पक्षी अपने को छोड़कर किसी अन्य को इस पद के योग्य नहीं मानता, तब निर्णय कैसे हो? तब उन्होंने गहरी नींद में सोए हुए उल्लू को देखकर विचार किया कि यह आत्मश्लाघा-हीन, पद-लिप्सा से रहित उल्लू ही हमारा राजा होगा। और सभी परस्पर आदेश देते हैं कि राज्याभिषेक की सामग्री लाई जाए।)

मूल: सर्वे पक्षिणः सज्जायै गन्तुमिच्छन्ति तर्हि सहसा एव—

हिन्दी अर्थ: जब सभी पक्षी तैयारी के लिए जाना चाहते हैं, तभी अचानक—

काकः: (अट्टहासपूर्णेन स्वरेण) सर्वथा अयुक्तमेतत् यन्मयूर-हंस-कोकिल-चक्रवाक-शुक-सारसादिषु पक्षिप्रधानेषु विद्यमानेषु दिवान्धस्यास्य करालवक्त्रस्याभिषेकार्थं सर्वे सज्जाः। पूर्णं दिनं यावत् निद्रायमाणः एषः कथमस्मान् रक्षिष्यति। वस्तुतस्तु—

हिन्दी अर्थ: (ठहाका लगाते हुए) यह सर्वथा अनुचित है कि मोर, हंस, कोयल, चकवा, तोता, सारस जैसे प्रधान पक्षियों के होते हुए, दिन में न देख पाने वाले, भयंकर मुख वाले इस उल्लू के अभिषेक के लिए सब तैयार हो रहे हैं। पूरे दिन सोते रहने वाला यह हमारी रक्षा कैसे करेगा। वास्तव में तो—

स्वभावरौद्रमत्युग्रं क्रूरमप्रियवादिनम्।
उलूकं नृपतिं कृत्वा का नु सिद्धिर्भविष्यति॥

हिन्दी अर्थ: स्वभाव से भयंकर, अत्यन्त उग्र, क्रूर और अप्रिय बोलने वाले उल्लू को राजा बनाकर आखिर क्या सिद्धि प्राप्त होगी?

(तब प्रकृतिमाता प्रवेश करती हैं।)

प्रकृतिमाता: (स्नेहपूर्वक) भोः भोः प्राणिनः। यूयम् सर्वे एव मे सन्ततयः। कथं मिथः कलहं कुरूथ। वस्तुतः सर्वे वन्यजीविनः अन्योन्याश्रिताः। सदैव स्मरत—

हिन्दी अर्थ: (स्नेह के साथ) हे प्राणियो! तुम सब मेरी ही सन्तान हो। तुम आपस में कलह क्यों करते हो? वास्तव में सभी वन्य प्राणी एक-दूसरे पर आश्रित हैं। सदा याद रखो—

ददाति प्रतिगृह्णाति, गुह्यमाख्याति पृच्छति।
भुङ्क्ते भोजयते चैव षड्-विधं प्रीतिलक्षणम्॥

हिन्दी अर्थ: देना और लेना, रहस्य कहना और पूछना, स्वयं खाना और दूसरों को खिलाना — ये छह प्रकार के व्यवहार सच्चे प्रेम के लक्षण हैं।

(सभी प्राणी मिलकर स्वर में कहते हैं — ‘हे माता! आप जो कह रही हैं वह सर्वथा सही है, परन्तु हम आपको नहीं जानते। आपका परिचय क्या है?’)

प्रकृतिमाता: अहं प्रकृतिः युष्माकं सर्वेषां जननी। यूयं सर्वे एव मे प्रियाः। सर्वेषामेव मत्कृते महत्त्वं विद्यते यथासमयम् न तावत् कलहेन समयं वृथा यापयन्तु अपि तु मिलित्वा एव मोदध्वं जीवनं च रसमयं कुरुध्वम्। तद्यथा कथितम्—

हिन्दी अर्थ: मैं प्रकृति हूँ, तुम सबकी माता। तुम सब ही मुझे प्रिय हो। तुम सबका मेरे लिए समय के अनुसार महत्त्व है, इसलिए कलह में व्यर्थ समय न बिताओ, बल्कि मिलकर ही आनन्दित रहो और जीवन को रसमय बनाओ। जैसा कि कहा गया है—

प्रजासुखे सुखं राज्ञः, प्रजानां च हिते हितम्।
नात्मप्रियं हितं राज्ञः, प्रजानां तु प्रियं हितम्॥

हिन्दी अर्थ: प्रजा के सुख में ही राजा का सुख है, प्रजा के हित में ही राजा का हित है। राजा का अपना हित नहीं, बल्कि प्रजा का प्रिय ही राजा का सच्चा हित है।

मूल: अपि च—

हिन्दी अर्थ: और भी—

अगाधजलसञ्चारी न गर्वं याति रोहितः।
अङ्गुष्ठोदकमात्रेण शफरी फुर्फुरायते॥

हिन्दी अर्थ: गहरे पानी में विचरण करने वाली बड़ी रोहू मछली कभी घमण्ड नहीं करती, जबकि थोड़े से पानी में छोटी मछली उछल-कूद मचाती है।

मूल: अतः भवन्तः सर्वेऽपि शफरीवत् एकैकस्य गुणस्य चर्चां विहाय, मिलित्वा प्रकृतिसौन्दर्याय वनरक्षायै च प्रयतन्ताम्।

हिन्दी अर्थ: इसलिए आप सब भी छोटी मछली की तरह (घमण्ड न करते हुए) अकेले-अकेले अपने गुण की चर्चा छोड़कर, मिलकर प्रकृति के सौन्दर्य और वन की रक्षा के लिए प्रयत्न करें।

मूल: सर्वे प्रकृतिमातरं प्रणमन्ति मिलित्वा दृढसंकल्पपूर्वकं च गायन्ति—

हिन्दी अर्थ: सभी प्रकृति माता को प्रणाम करते हैं और मिलकर दृढ़ संकल्प के साथ गाते हैं—

प्राणिनां जायते हानिः परस्परविवादतः।
अन्योन्यसहयोगेन लाभस्तेषां प्रजायते॥

हिन्दी अर्थ: प्राणियों को आपसी विवाद से हानि होती है, जबकि परस्पर सहयोग से उन्हें लाभ प्राप्त होता है।

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पाठ का सार (एक पंक्ति में)

वन में सिंह, वानर, काक, कोयल, गज, बक, मयूर आदि सभी प्राणी अपने-अपने को वनराज पद के योग्य बताते हुए एक-दूसरे की निन्दा करते हैं। अन्त में प्रकृति माता प्रकट होकर सबको यह सन्देश देती हैं कि सभी प्राणी उसकी सन्तान हैं, समय के अनुसार सबका महत्त्व है, और आपसी कलह से हानि तथा परस्पर सहयोग से ही सबका लाभ और कल्याण सम्भव है।

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