परिचय – विचित्रः साक्षी
📜 श्लोक-वार हिंदी अनुवाद – विचित्रः साक्षी
सप्तमः पाठः
विचित्रः साक्षी
भाग-अ : गद्यांश एवं हिन्दी अनुवाद (Sanskrit Text with Hindi Translation)
अनुच्छेद 1 (संस्कृत):
अयं पाठः ओम्प्रकाशठक्कुरविरचितायाः कथायाः सम्पादितः अंशः अस्ति। इयं कथा बङ्गसाहित्यकार- बंकिमचन्द्रचटर्जीद्वारा न्यायाधीशरूपेण प्रदत्तनिर्णयोपरि आधारिता अस्ति। न्यायकर्तारः सत्यासत्यनिर्णयार्थं यदा-कदा तादृशीनां युक्तीनां प्रयोगं कुर्वन्ति याभिः प्रमाणं विनापि न्यायः स्यात्। अस्यां कथायामपि न्यायाधीशेन तथैव मार्गः आचरितः।
हिंदी अनुवाद:
यह पाठ ओमप्रकाश ठाकुर द्वारा रचित कथा का संपादित अंश है। यह कथा बंगला साहित्यकार बंकिमचंद्र चटर्जी द्वारा न्यायाधीश के रूप में दिए गए निर्णय पर आधारित है। न्यायाधीश सत्य-असत्य के निर्णय के लिए कभी-कभी ऐसी युक्तियों का प्रयोग करते हैं जिनसे प्रमाण के बिना भी न्याय हो सके। इस कथा में भी न्यायाधीश ने वैसा ही मार्ग अपनाया।
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💬 Talk to a Counsellor Class 10 • Expert Faculty • Regular Tests • Doubt Supportअनुच्छेद 2 (संस्कृत):
कश्चन निर्धनो जनः भूरि परिश्रम्य किञ्चिद् वित्तमुपार्जितवान्। तेन वित्तेन स्वपुत्रम् एकस्मिन् महाविद्यालये प्रवेशं दापयितुं सफलो जातः। तत्तनयः तत्रैव छात्रावासे निवसन् अध्ययने संलग्नः समभूत्। एकदा स पिता तनूजस्य रुग्णतामाकर्ण्य व्याकुलो जातः पुत्रं द्रष्टुं च प्रस्थितः। परमर्थकार्श्येन पीडितः स बसयानं विहाय पदातिरेव प्राचलत्।
हिंदी अनुवाद:
किसी निर्धन व्यक्ति ने बहुत परिश्रम करके कुछ धन कमाया। उस धन से वह अपने पुत्र को एक महाविद्यालय में प्रवेश दिलाने में सफल हुआ। उसका पुत्र वहीं छात्रावास में रहते हुए अध्ययन में लगा हुआ था। एक बार वह पिता पुत्र की बीमारी सुनकर व्याकुल हो गया और पुत्र को देखने चला। धन की कमी से पीड़ित वह बस-यान (बस) छोड़कर पैदल ही चल पड़ा।
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अनुच्छेद 3 (संस्कृत):
पदातिक्रमेण संचलन् सायं समयेऽप्यसौ गन्तव्याद् दूरे आसीत्। ‘निशान्धकारे प्रसृते विजने प्रदेशे पदयात्रा न शुभावहा’, एवं विचार्य स पार्श्वस्थिते ग्रामे रात्रिनिवासं कर्तुं कञ्चिद् गृहस्थमुपागतः। करुणापरो गृही तस्मै आश्रयं प्रायच्छत्।
हिंदी अनुवाद:
पैदल चलते हुए सायंकाल के समय भी वह अपने गंतव्य से दूर था। ‘रात्रि का अंधकार फैलने पर सुनसान स्थान में पैदल यात्रा करना शुभ नहीं है’ — ऐसा सोचकर वह पास के गाँव में रात्रि निवास करने के लिए किसी गृहस्थ के पास गया। दयालु गृहस्थ ने उसे आश्रय दिया।
अनुच्छेद 4 (संस्कृत):
विचित्रा दैवगतिः। तस्यामेव रात्रौ तस्मिन् गृहे कश्चन चौरः गृहाभ्यन्तरं प्रविष्टः। तत्र निहितामेकां मञ्जूषाम् आदाय पलायितः। चौरस्य पादध्वनिना प्रबुद्धोऽतिथिः चौरशङ्क्या तमन्वधावत् अगृह्णाच्च, परं तदानीमेव किञ्चिद् विचित्रमघटत। चौरः एव उच्चैः क्रोशितुमारभत ‘चौरोऽयं चौरोऽयम्’ इति। तस्य तारस्वरेण प्रबुद्धाः ग्रामवासिनः स्वगृहाद् निष्क्रम्य तत्रागच्छन् वराकमतिथिमेव च चौरं मत्वाऽभर्त्सयन्। यद्यपि ग्रामस्य आरक्षी एव चौर आसीत्। तत्क्षणमेव रक्षापुरुषः तम् अतिथिं चौरोऽयम् इति प्रख्याप्य कारागृहे प्राक्षिपत्।
हिंदी अनुवाद:
भाग्य की गति विचित्र होती है। उसी रात उस घर में कोई चोर घर के भीतर घुसा। वहाँ रखी हुई एक पेटी लेकर भाग गया। चोर के पैरों की आवाज़ से जागा हुआ अतिथि चोर की आशंका से उसके पीछे दौड़ा और उसे पकड़ लिया, परन्तु उसी समय कुछ विचित्र घटित हुआ। चोर ही ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगा — ‘यह चोर है, यह चोर है’। उसकी ऊँची आवाज़ से जागे हुए गाँव के लोग अपने घरों से निकलकर वहाँ आए और बेचारे अतिथि को ही चोर मानकर उसे भला-बुरा कहने लगे। यद्यपि गाँव का सिपाही (आरक्षी) ही असली चोर था। उसी क्षण सिपाही ने उस अतिथि को ‘यह चोर है’ घोषित करके जेल में डाल दिया।
अनुच्छेद 5 (संस्कृत):
अग्रिमे दिने स आरक्षी चौर्याभियोगे तं न्यायालयं नीतवान्। न्यायाधीशो बंकिमचन्द्रः उभाभ्यां पृथक्-पृथक् विवरणं श्रुतवान्। सर्वं वृत्तमवगत्य स तं निर्दोषम् अमन्यत आरक्षिणं च दोषभाजनम्। किन्तु प्रमाणाभावात् स निर्णेतुं नाशक्नोत्। ततोऽसौ तौ अग्रिमे दिने उपस्थातुम् आदिष्टवान्। अन्येद्युः तौ न्यायालये स्व-स्व-पक्षं पुनः स्थापितवन्तौ। तदैव कश्चित् तत्रत्यः कर्मचारी समागत्य न्यवेदयत् यत् इतः क्रोशद्वयान्तराले कश्चिज्जनः केनापि हतः। तस्य मृतशरीरं राजमार्गं निकषा वर्तते। आदिश्यतां किं करणीयमिति। न्यायाधीशः आरक्षिणम् अभियुक्तं च तं शवं न्यायालये आनेतुमादिष्टवान्।
हिंदी अनुवाद:
अगले दिन वह सिपाही चोरी के आरोप में उसे न्यायालय ले गया। न्यायाधीश बंकिमचंद्र ने दोनों से अलग-अलग विवरण सुना। सारा वृत्तांत जानकर उसने उसे निर्दोष माना और सिपाही को दोषी माना। किन्तु प्रमाण के अभाव में वह निर्णय नहीं कर सका। तब उसने दोनों को अगले दिन उपस्थित होने का आदेश दिया। दूसरे दिन वे दोनों न्यायालय में अपना-अपना पक्ष पुनः प्रस्तुत करने लगे। उसी समय वहाँ के किसी कर्मचारी ने आकर सूचित किया कि यहाँ से दो कोस की दूरी पर किसी व्यक्ति की किसी के द्वारा हत्या कर दी गई है। उसका मृत शरीर राजमार्ग के पास पड़ा है। आदेश दिया जाए कि क्या करना चाहिए। न्यायाधीश ने सिपाही और अभियुक्त दोनों को उस शव को न्यायालय में लाने का आदेश दिया।
अनुच्छेद 6 (संस्कृत):
आदेशं प्राप्य उभौ प्राचलताम्। तत्रोपेत्य काष्ठपटले निहितं पटाच्छादितं देहं स्कन्धेन वहन्तौ न्यायाधिकरणं प्रति प्रस्थितौ। आरक्षी सुपुष्टदेह आसीत्, अभियुक्तश्च अतीव कृशकायः। भारवतः शवस्य स्कन्धेन वहनं तत्कृते दुष्करम् आसीत्। स भारवेदनया क्रन्दति स्म। तस्य क्रन्दनं निशम्य मुदित आरक्षी तमुवाच- ‘रे दुष्ट! तस्मिन् दिने त्वयाऽहं चोरितायाः मञ्जूषायाः ग्रहणाद् वारितः। इदानीं निजकृत्यस्य फलं भुङ्क्ष्व। अस्मिन् चौर्याभियोगे त्वं वर्षत्रयस्य कारादण्डं लप्स्यसे’ इति प्रोच्य उच्चैः अहसत्। यथाकथञ्चिद् उभौ शवमानीय एकस्मिन् चत्वरे स्थापितवन्तौ।
हिंदी अनुवाद:
आदेश पाकर दोनों चल पड़े। वहाँ जाकर लकड़ी के तख्ते पर रखे हुए कपड़े से ढके शरीर को कंधे पर उठाकर दोनों न्यायालय की ओर चले। सिपाही हृष्ट-पुष्ट शरीर वाला था, और अभियुक्त अत्यंत दुबले शरीर वाला। भारी शव को कंधे पर ढोना उसके लिए कठिन था। वह भार की पीड़ा से रो रहा था। उसका रोना सुनकर प्रसन्न हुए सिपाही ने उससे कहा — ‘रे दुष्ट! उस दिन तूने मुझे चुराई हुई पेटी लेने से रोका था। अब अपने किए का फल भोग। इस चोरी के आरोप में तुझे तीन वर्ष का कारादंड मिलेगा’ — ऐसा कहकर वह ज़ोर से हँसा। जैसे-तैसे दोनों शव को लाकर एक चौराहे पर रख आए।
अनुच्छेद 7 (संस्कृत):
न्यायाधीशेन पुनस्तौ घटनायाः विषये वक्तुमादिष्टौ। आरक्षिणि निजपक्षं प्रस्तुतवति आश्चर्यमघटत् स शवः प्रावारकमपसार्य न्यायाधीशमभिवाद्य निवेदितवान्- मान्यवर! एतेन आरक्षिणा अध्वनि यदुक्तं तद् वर्णयामि ‘त्वयाऽहं चोरितायाः मञ्जूषायाः ग्रहणाद् वारितः, अतः निजकृत्यस्य फलं भुङ्क्ष्व। अस्मिन् चौर्याभियोगे त्वं वर्षत्रयस्य कारादण्डं लप्स्यसे’ इति।
हिंदी अनुवाद:
न्यायाधीश ने फिर उन दोनों को घटना के विषय में बताने का आदेश दिया। सिपाही के अपना पक्ष प्रस्तुत करते समय आश्चर्य घटित हुआ — वह शव कपड़ा हटाकर न्यायाधीश को प्रणाम करके निवेदन करने लगा — मान्यवर! इस सिपाही ने रास्ते में जो कहा था, वह मैं बताता हूँ — ‘तूने मुझे चुराई हुई पेटी लेने से रोका था, इसलिए अपने किए का फल भोग। इस चोरी के आरोप में तुझे तीन वर्ष का कारादंड मिलेगा’ — ऐसा उसने कहा था।
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अनुच्छेद 8 (संस्कृत):
न्यायाधीशः आरक्षिणे कारादण्डमादिश्य तं जनं ससम्मानं मुक्तवान्।
अत एवोच्यते – दुष्कराण्यपि कर्माणि मतिवैभवशालिनः।
नीतिं युक्तिं समालम्ब्य लीलयैव प्रकुर्वते॥
हिंदी अनुवाद:
न्यायाधीश ने सिपाही को कारावास का दंड देकर उस व्यक्ति (अभियुक्त) को सम्मानपूर्वक मुक्त कर दिया। इसीलिए कहा जाता है — बुद्धि के वैभव से संपन्न लोग कठिन कार्यों को भी नीति और युक्ति का सहारा लेकर खेल-खेल में ही कर डालते हैं।
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