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class 10 sanskrit chapter 10 hindi translation
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class 10 sanskrit chapter 10 hindi translation

by | Jul 21, 2025 | 0 comments

परिचय – अन्योक्तयः

अन्योक्ति का अर्थ है—“अप्रत्यक्ष रूप से कही गई बात।” इस पाठ में सात श्लोकों के माध्यम से प्रशंसा या निंदा को संकेतों द्वारा व्यक्त किया गया है, जैसे राजहंस, कोयल, बादल, माली, सरोवर, चातक आदि के माध्यम से सत्कर्म, कृतज्ञता, विवेक और आत्मसम्मान जैसे गुणों को उजागर किया गया है।

🧠 Convex Classes Jaipur में हम इस पाठ को सरल हिंदी अनुवाद के साथ प्रस्तुत करते हैं ताकि छात्र इसे आसानी से समझ सकें और परीक्षा में आत्मविश्वास से लिख सकें।

📜 श्लोक-वार हिंदी अनुवाद – अन्योक्तयः

नीचे हर संस्कृत श्लोक के साथ उसका हिंदी अनुवाद दिया गया है—step-by-step।

श्लोक 1

एकेन राजहंसेन या शोभा सरसो भवेत्। न सा बकसहस्रेण परितस्तीरवासिना॥

🗣️ एक राजहंस से सरोवर की जो शोभा होती है, वह हजारों बगुलों से नहीं होती। 👉 भाव: एक गुणी व्यक्ति की उपस्थिति समाज को सुंदर बनाती है, न कि केवल संख्या से।

श्लोक 2

भुक्ता मृणालपटली भवता निपीतान्यम्बूनि। नलिनानि निषेवितानि रे राजहंस! वद तस्य सरोवरस्य। कृत्येन केन भवितासि कृतोपकारः॥

🗣️ हे राजहंस! तुमने उस सरोवर से कमलनाल खाए, जल पिया, कमल का सेवन किया—अब बताओ, उस उपकार का बदला किस कार्य से चुकाओगे? 👉 भाव: जिस स्थान या व्यक्ति से लाभ लिया जाए, उसका उपकार मानना और लौटाना आवश्यक है।

श्लोक 3

तोयैरल्पैरपि करुणया भीमभानौ निदाघे। मालाकार! व्यरचि भवता या तरोरस्य पुष्टि:। सा किं शक्या जनयितुमिह प्रावृषेण्येन वारां। धारासारानपि विकिरता विश्वतो वारिदेन॥

🗣️ हे माली! गर्मी में थोड़े जल से जो पेड़ की पुष्टि की गई, क्या वह वर्षा में बादल की भारी जलधारा से भी संभव है? 👉 भाव: सच्चा पोषण केवल मात्रा से नहीं, भावना और समय की उपयुक्तता से होता है।

श्लोक 4

आपेदिरेऽम्बरपथं परितः पतङ्गाः। भृङ्गा रसालमुकुलानि समाश्रयन्ते। सङ्कोचमञ्चति सरस्त्वयि दीनदीनो। मीनो नु हन्त कतमां गतिमभ्युपैतु॥

🗣️ पक्षी आकाश में उड़ गए, भौंरे आम की कलियों में रम गए। सरोवर सूख गया—अब बेचारा मछली कहाँ जाए? 👉 भाव: संकट में साथ छोड़ने वाले मित्रों की तुलना में, सच्चा साथी वही है जो अंत तक साथ निभाए।

श्लोक 5

एक एव खगो मानी वने वसति चातकः। पिपासितो वा म्रियते याचते वा पुरन्दरम्॥

🗣️ एकमात्र स्वाभिमानी पक्षी चातक वन में रहता है—या तो प्यासा मर जाता है या इंद्र से वर्षा की याचना करता है। 👉 भाव: आत्मसम्मान के लिए त्याग करना भी श्रेष्ठ है; सच्चे स्वाभिमानी कभी समझौता नहीं करते।

श्लोक 6

आश्वास्य पर्वतकुलं तपनोष्णतप्तम्। उद्दामदावविधुराणि च काननानि। नानानदीनदशतानि च पूरयित्वा। रिक्तोऽसि यज्जलद! सैव तवोत्तमा श्रीः

🗣️ हे बादल! पर्वतों, वनों और नदियों को जल देकर यदि तुम खाली हो गए, तो वही तुम्हारी श्रेष्ठ शोभा है। 👉 भाव: दूसरों को देने के बाद स्वयं रिक्त होना ही सच्चा त्याग और महानता है।

श्लोक 7

रे रे चातक! सावधानमनसा मित्र! क्षणं श्रूयताम्। अम्भोदा बहवो हि सन्ति गगने सर्वेऽपि नैतादृशाः। केचिद् वृष्टिभिरार्द्रयन्ति वसुधां गर्जन्ति केचिद् वृथा। यं यं पश्यसि तस्य तस्य पुरतो मा ब्रूहि दीनं वचः॥

🗣️ हे चातक! सावधान होकर सुनो—आकाश में कई बादल हैं, पर सभी एक जैसे नहीं। कुछ वर्षा करते हैं, कुछ केवल गरजते हैं। इसलिए हर किसी के सामने अपनी पीड़ा मत कहो। 👉 भाव: हर व्यक्ति सहायक नहीं होता; विवेक से ही अपनी बात कहनी चाहिए।

निष्कर्ष

यह पाठ हमें सिखाता है कि गुणों की पहचान, कृतज्ञता, आत्मसम्मान, विवेक और त्याग ही जीवन की सच्ची शोभा हैं। संकेतों के माध्यम से कही गई बातें मन में गहराई से उतरती हैं, और यही अन्योक्ति की शक्ति है।

🧠 Convex Classes Jaipur में हम प्रत्येक संस्कृत पाठ को सरल, अर्थपूर्ण और परीक्षा-केंद्रित रूप में प्रस्तुत करते हैं—ताकि छात्र केवल अंक ही नहीं, समझ भी पाएं।

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