सत्यं शिवं सुन्दरं संस्कृतम्
(प्रथमः पाठः — पूर्ण हिन्दी अनुवाद सहित)
गद्यांश (परिचय)
संस्कृतं भारतदेशस्य सम्पदस्ति। अस्मिन् भारतीयानां ज्ञानवैभवं सञ्चितमस्ति। संस्कृताध्ययनेन मानवः सुसंस्कृतः भवति। भारतीयभाषाणां सुचारुरूपेण अध्ययनार्थं संस्कृतं नितराम् अपेक्षितम् अस्ति। संस्कृताध्ययनेन किं किं साधितं भवति इति विषयम् अधिकृत्य कविना सुन्दरं गीतं प्रस्तुतम्।
हिन्दी अनुवाद — संस्कृत भारत देश की संपत्ति (धरोहर) है। इसमें भारतीयों का ज्ञान-वैभव संचित (इकट्ठा) है। संस्कृत पढ़ने से मनुष्य सुसंस्कृत (सभ्य/सुसंस्कारी) बनता है। भारतीय भाषाओं को अच्छी तरह पढ़ने-समझने के लिए संस्कृत बहुत आवश्यक है। संस्कृत पढ़ने से क्या-क्या लाभ होते हैं — इस विषय पर कवि ने एक सुंदर गीत प्रस्तुत किया है।
गीत — श्लोकवार हिन्दी भावार्थ
श्लोक 1
भारतीयैकतासाधकं संस्कृतम्
भारतीयत्वसम्पादकं संस्कृतम्
ज्ञानपुञ्जप्रभादर्शकं संस्कृतम्
सर्वदानन्दसन्दोहदं संस्कृतम्॥ १ ॥
सरल हिन्दी भावार्थ — संस्कृत भारतीयों की एकता को सिद्ध करने वाली है, भारतीयता (भारतीय पहचान) को प्राप्त कराने वाली है। यह ज्ञान के समूह की चमक (प्रकाश) दिखाने वाली है और हमेशा आनंद का समूह देने वाली है।
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सर्वमस्तिष्कसंस्कारकं संस्कृतम्
सर्ववाणीपरिष्कारकं संस्कृतम्
सत्पथप्रेरणादायकं संस्कृतम्
सद्गुणग्रामसन्धायकं संस्कृतम्॥ २ ॥
सरल हिन्दी भावार्थ — संस्कृत सबके मस्तिष्क (मन-बुद्धि) को संस्कारवान बनाने वाली है, सबकी वाणी को शुद्ध और सुंदर बनाने वाली है। यह सही मार्ग पर चलने की प्रेरणा देने वाली है और अच्छे गुणों का समूह जोड़ने (उत्पन्न करने) वाली है।
श्लोक 3
विश्वबन्धुत्वविस्तारकं संस्कृतम्
सर्वभूतैकताकारकं संस्कृतम्
सर्वतः शान्तिसंस्थापकं संस्कृतम्
पञ्चशीलप्रतिष्ठापकं संस्कृतम्॥ ३ ॥
सरल हिन्दी भावार्थ — संस्कृत पूरे विश्व में भाईचारे की भावना को फैलाने वाली है, सभी प्राणियों में एकता स्थापित करने वाली है। यह हर जगह शांति स्थापित करने वाली है और (बौद्ध धर्म के) प्रसिद्ध पाँच शीलों (नियमों) को स्थापित करने वाली है।
श्लोक 4
त्यागसन्तोषसेवाव्रतं संस्कृतम्
विश्वकल्याणनिष्ठायुतं संस्कृतम्
ज्ञानविज्ञानसम्मेलनं संस्कृतम्
भुक्तिमुक्तिद्वयोद्वेलनं संस्कृतम्॥ ४ ॥
सरल हिन्दी भावार्थ — संस्कृत त्याग, संतोष और सेवा के व्रत का पालन कराने वाली है, संसार के कल्याण की भावना से युक्त है। यह ज्ञान और विज्ञान को आपस में मिलाने वाली है, तथा भोग (सांसारिक सुख) और मोक्ष — दोनों को जगाने (प्राप्त कराने) वाली है।
श्लोक 5
धर्मकामार्थमोक्षप्रदं संस्कृतम्
ऐहिकामुष्मिकोत्कर्षदं संस्कृतम्
कर्मदं ज्ञानदं भक्तिदं संस्कृतम्
सत्यनिष्ठं शिवं सुन्दरं संस्कृतम्॥ ५ ॥
सरल हिन्दी भावार्थ — संस्कृत धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष — इन चारों पुरुषार्थों को देने वाली है। यह इस लोक (सांसारिक जीवन) और परलोक — दोनों में उन्नति देने वाली है। यह अच्छे कर्म, ज्ञान और भक्ति देने वाली है। इसीलिए संस्कृत सत्य पर आधारित, कल्याणकारी (शिव) और सुंदर है।
श्लोक 6
शब्दलालित्यलीलावनं संस्कृतम्
चारुमाधुर्यधारागृहं संस्कृतम्
विश्वचेतश्चमत्कारकं संस्कृतम्
पूर्वजानां यश: स्मारकं संस्कृतम्॥ ६ ॥
सरल हिन्दी भावार्थ — संस्कृत में शब्दों की सुंदरता का क्रीड़ा-उद्यान (खेलने का बगीचा) है, यह मधुर रस की सुंदर धारा का घर है। यह पूरे विश्व के मन को चमत्कृत (आश्चर्यचकित) करने वाली है। यह हमारे पूर्वजों के यश (कीर्ति) की याद दिलाने वाली है।
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📞 सम्पर्क करें: 8290601516भावार्थ (पाठ के अंत में दिया गया सार) — हिन्दी में
१ — संस्कृत भाषा भारतीयों की एकता सिद्ध करती है, भारतीयता प्रदान करती है, ज्ञान-समूह की चमक दिखाती है, और सदा आनंद की परंपरा उत्पन्न करती है।
२ — संस्कृत सभी लोगों के मन को शुद्ध करती है, वचनों (बोली) को सुधारती है, सही मार्ग दिखाती है, और अच्छे गुणों का समूह उत्पन्न करती है।
३ — संस्कृत विश्व-बंधुत्व (सारे संसार में भाईचारा) बढ़ाती है, सभी प्राणियों में एकता का बोध कराती है, हर जगह शांति स्थापित करती है, और प्रसिद्ध पाँच शीलों की रीति (तरीका) सिखाती है।
४ — त्याग का, हर्ष (खुशी) का, सेवा और बुद्धि का व्रत; संसार का कल्याण करना ही कर्तव्य है — यह ज्ञान; विज्ञान को भी साथ लाना चाहिए — यह विचार; भोग और मोक्ष का मार्ग — यह सब संस्कृत से प्राप्त होता है।
५ — इस लोक और परलोक में संस्कृत से उन्नति मिलती है। धर्म, काम, अर्थ और मोक्ष के साधन भी संस्कृत से मिलते हैं। भक्ति करने, ज्ञान प्राप्त करने और कर्म करने का साधन संस्कृत है। इसलिए संस्कृत सत्य, शिव (कल्याणकारी) और सुंदर है।
६ — सुंदर पद्य (कविताएँ) संस्कृत रूपी वन में वृक्षों के समान हैं। खोजने वाले के लिए संस्कृत मधुरता और सुंदरता के ठंडे घर के समान आनंददायक है। संस्कृत सुनकर पूरे संसार के लोग चमत्कृत हो जाते हैं। इसलिए ऐसी यह संस्कृत हमारे भारतीय पूर्वजों द्वारा अर्जित यश-राशि (कीर्ति) की परिचायक (द्योतक) है।
कविकाव्यपरिचयः (कवि परिचय) — हिन्दी में
परिचय — वाराणसी में स्थित ‘सार्वभौम संस्कृत प्रचार कार्यालय’ के संस्थापक पंडित वासुदेव शास्त्री द्विवेदी इस गीत के रचयिता (लेखक) हैं। उन्होंने सरल संस्कृत में अनेक ग्रंथ लिखे तथा संस्कृत के प्रचार के लिए बहुत सारा साहित्य प्रकाशित किया। उन्होंने ‘परमार्थसुधा’ नामक संस्कृत पत्रिका का भी संपादन किया। उनके प्रसिद्ध ग्रंथों में सुरभारतीसन्देशः, स्वर्गीयसंस्कृतकविसम्मेलनम्, भोजराज्ये संस्कृतसाम्राज्यम्, और कौत्सस्य गुरुदक्षिणा आदि शामिल हैं।



