Introduction
Class 12 Sanskrit Chapter 3 Hindi Anuvad विद्यार्थियों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण अध्ययन सामग्री है। इस अध्याय में महाकवि भवभूति द्वारा रचित उत्तररामचरितम् का एक भावपूर्ण प्रसंग प्रस्तुत किया गया है, जिसमें लव, कौसल्या, जनक और अरुन्धती के बीच संवादों के माध्यम से वात्सल्य, करुणा तथा पारिवारिक भावनाओं का सुंदर चित्रण किया गया है।
इस अध्याय में लव के व्यक्तित्व, उसके विनम्र व्यवहार तथा श्रीराम के गुणों की झलक दिखाई देती है। संस्कृत भाषा के कठिन श्लोकों और संवादों को समझने के लिए विद्यार्थियों को सरल हिन्दी अनुवाद की आवश्यकता होती है। इसी उद्देश्य से यहाँ Chapter 3 का सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद सरल एवं परीक्षा-उपयोगी भाषा में प्रस्तुत किया गया है, जिससे विद्यार्थी अध्याय के भावार्थ को आसानी से समझ सकें और बोर्ड परीक्षा में अच्छे अंक प्राप्त कर सकें।
Class 12th Sanskrit Chapter 3 Hindi Anuvad | कक्षा 12वीं संस्कृत (शाश्वती भाग-2 या भास्वती भाग-2) के पाठ 3 ‘बालकौतुकम्’ Hindi Anuvad
जनकः :
अये, शिष्टानध्याय इत्यस्थलिते खेलतां वृद्धौ कोलाहलः।
कौसल्या :
सुलभसौख्यमिदानीं बालत्वं भवति। अहो, एषां मध्ये क एष
रामभद्रस्य मुखकमलनिर्गतैः दुर्धरकोशाभ्यां लोचने शीतलयति?
अरुन्धती :
कुवलयदलस्निग्धश्यामः शिखण्डकमण्डनो
वपुषि विरचितः पुण्यश्लोकः प्रियैव समाजनन्।
पुनरपि शिशुभूतो वत्सः स मे रघुनन्दनो
झटिति कुरुते दुःखं काण्डे दुर्गमुताज्जनम् ॥११॥
जनकः : (विस्मयेन)
भोः! किमेतत्।
महिमानमेतस्मिन् विनयविशिष्टे मौञ्जीबन्धने
विद्वद्भिर्निजैर्न पुनर्विवदवैरधैर्यतिरयः।
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जनक :
अरे! आज तो इन बालकों के खेल-कूद के कारण यहाँ वृद्ध लोगों के बीच भी बड़ा कोलाहल मच गया है।
कौसल्या :
बाल्यावस्था में सुख और सरलता सहज ही प्राप्त होती है। अहो! इन लोगों के बीच यह कौन है जो श्रीराम के मुखकमल से निकले हुए मधुर वचनों के समान अपनी वाणी से सबके हृदय और नेत्रों को शीतल कर रहा है?
अरुन्धती :
यह बालक नीले कमल के समान कोमल और श्यामवर्ण है, सिर पर मोरपंख धारण किए हुए है तथा अपने रूप और गुणों से सबको प्रिय लगता है। इसे देखकर ऐसा प्रतीत होता है मानो मेरा प्रिय रघुनन्दन (राम) पुनः बालक बनकर सामने आ गया हो। उसे देखकर मेरे हृदय में वर्षों पुरानी स्मृतियाँ जाग उठती हैं और मन भावविह्वल हो जाता है।
जनक : (आश्चर्य से)
अरे! यह क्या है?
भावार्थ :
इस मौञ्जी (यज्ञोपवीत) धारण करने वाले विनयी बालक में असाधारण तेज और महानता दिखाई देती है। विद्वानों को उसके गुणों का सम्मान करना चाहिए, उसके विषय में व्यर्थ विवाद या विरोध करना उचित नहीं है।
मनो मे सम्मोहस्थिरमपि हर्षेण बलवान्
अयोध्यायूं यद्वत्सलपुरुषाकारमनपश्यत् ॥
लवः : (प्रविश्य, स्वागतम्)
अतिज्ञातवयः! कनीयसियात् पूज्यानपि सतः
कथमभिवादयिष्ये? (विचिन्त्य) अयं पुनर्वृद्धप्रकार इति
वृद्धेभ्यः भ्रातो। (सविनयमुपसृत्य) एष वः लवस्य शिरसा
प्रणामपर्यायः।
अरुन्धती-जनकौ :
कल्याणिन्! आयुष्मान् भूयाः।
कौसल्या :
जात! चिरं जीव।
अरुन्धती :
एहि वत्स! (लवमुखमुद्रां गृहीत्वा आत्मगतं) दृष्ट्या न केवलं
मुग्धस्मितचारुमनोहरोऽपि मे पूरितः।
हिन्दी अनुवाद
(श्लोक का भावार्थ)
मेरा मन पहले से ही मोह और भावनाओं से भरा हुआ था, परन्तु इस बालक को देखकर हर्ष और भी बढ़ गया। इसका स्वरूप अयोध्या के उन वात्सल्यपूर्ण पुरुषों की याद दिलाता है।
लव : (प्रवेश करते हुए)
आप सभी का स्वागत है। ये सभी मुझसे आयु में बड़े और पूजनीय हैं। मैं इनका अभिवादन किस प्रकार करूँ? (सोचकर) अच्छा, यही उचित है कि मैं वृद्धजनों को प्रणाम करूँ। (विनम्रतापूर्वक आगे बढ़कर) यह लव का सिर झुकाकर किया गया प्रणाम आप सभी के लिए है।
अरुन्धती और जनक :
हे कल्याणकारी बालक! तुम दीर्घायु होओ।
कौसल्या :
पुत्र! तुम चिरंजीवी रहो।
अरुन्धती :
आओ वत्स! (मन ही मन लव के मुख की ओर देखकर) केवल इसका रूप ही नहीं, बल्कि इसकी मोहक मुस्कान और मनोहर व्यवहार भी मेरे हृदय को अत्यन्त प्रसन्न कर रहे हैं।
कौसल्या :
जात! इतोऽपि तावदेहि। (उत्सङ्गे गृहीत्वा) अहो, न केवलं
मांसलोन्नतेन देहबन्धेन, कलकण्ठकोमल-घनगुञ्जनादिना स्वरेण
च रामभद्रस्मृतिं जनयति। पश्यामि ते मुखपुण्डरीकम्।
(विचक्य-सुन्मध्य, निर्ख्य, स्वागतम्) राजन्! किं न पश्यसि? निपुणं
निलक्ष्यमाणो वत्सस्य मे बाला मुखचन्द्रेणापि संवादयते।
जनकः :
पश्यामि, सखि! पश्यामि। (निर्ख्य)
वत्सलायाश्च रघूद्वहस्य च शिशवावस्मिन्नभिव्यज्यते,
संवृत्तिः प्रतिबिम्बितेव निखिला सेवाकृतिः सा धृतिः।
सा वाणी विनयः स एव सहजः पुण्यानुभावोऽप्यसौ।
हा हा देवि! किमप्येतन्मे मनः पारिप्लवं धावति॥
कौसल्या :
जात! अस्ति ते माता? स्मरसि वा ताम्?
लवः :
नहि।
कौसल्या :
ततः कस्य त्वम्?
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कौसल्या :
पुत्र! इधर भी आओ। (गोद में लेते हुए) अहो! यह बालक केवल अपने सुडौल और आकर्षक शरीर से ही नहीं, बल्कि अपनी कोयल के समान मधुर तथा गंभीर वाणी से भी मुझे श्रीराम की याद दिलाता है। मैं इसके कमल के समान सुंदर मुख को देख रही हूँ।
हे राजन्! क्या आप भी यह नहीं देख रहे हैं? ध्यानपूर्वक देखने पर ऐसा प्रतीत होता है कि यह बालक अपने मुखचन्द्र द्वारा मुझसे कुछ कह रहा है।
जनक :
हाँ सखि! मैं भी देख रहा हूँ।
इस बालक में रघुवंश-श्रेष्ठ श्रीराम और उनकी वात्सल्यमयी प्रकृति दोनों ही स्पष्ट दिखाई देती हैं। ऐसा लगता है मानो उनका सम्पूर्ण आचरण, सेवा-भाव, धैर्य, विनम्रता और श्रेष्ठ चरित्र इसमें प्रतिबिम्बित हो उठा हो। इसकी वाणी, इसका विनय और इसका स्वाभाविक पुण्य-प्रभाव भी उसी की याद दिलाता है।
हाय देवि! यह सब देखकर मेरा मन अत्यन्त भावविह्वल हो रहा है।
कौसल्या :
पुत्र! क्या तुम्हारी माता है? क्या तुम्हें उसकी स्मृति है?
लव :
नहीं।
कौसल्या :
तो फिर तुम किसके पुत्र हो?
भावार्थ
लव को देखकर कौसल्या और जनक दोनों को श्रीराम की याद आ जाती है। उसके रूप, स्वभाव, विनम्रता और वाणी में उन्हें राम के गुण दिखाई देते हैं। भावुक होकर कौसल्या लव से उसकी माता के विषय में पूछती हैं, परन्तु लव अपनी माता को नहीं जानता। इससे कथा में आगे एक महत्वपूर्ण मोड़ आता है।
कौसल्या :
जात! अस्ति ते माता? स्मरसि वा ताम्?
लवः :
नहि।
कौसल्या :
ततः कस्य त्वम्?
लवः :
भगवतः सुग्रीहितनामधेयस्य वाल्मीकेः।
कौसल्या :
अगि जात! कथयितव्यं कथय।
हिन्दी अनुवाद
कौसल्या :
पुत्र! क्या तुम्हारी माता है? क्या तुम्हें अपनी माता की स्मृति है?
लव :
नहीं।
कौसल्या :
तो फिर तुम किसके पुत्र हो?
लव :
मैं भगवान् वाल्मीकि का शिष्य हूँ और उन्हीं के संरक्षण में रहता हूँ।
कौसल्या :
अच्छा पुत्र! जो कुछ बताने योग्य हो, वह बताओ।
भावार्थ
कौसल्या लव से उसके माता-पिता के विषय में पूछती हैं, किन्तु लव अपनी माता को नहीं जानता। जब कौसल्या उससे उसके परिचय के बारे में पूछती हैं, तब वह स्वयं को महर्षि वाल्मीकि के आश्रम का बालक बताता है। इससे स्पष्ट होता है कि लव का पालन-पोषण वाल्मीकि आश्रम में हुआ है। कौसल्या उसके बारे में अधिक जानने की उत्सुकता प्रकट करती हैं और उससे अपना परिचय बताने के लिए कहती हैं।
लवः : एतावदेव जानामि।
👉 लवः : मैं केवल इतना ही जानता हूँ।
(प्रवेश्य सम्भाषणात:)
👉 (संवाद में प्रवेश करते हुए कहा।)
बटवः : कुमार! कुमार! अश्वोद्योग इति कोऽपि भूत्विवेशो जनपदवन्तुश्रुतः, सोऽयमधुनास्माभिः स्वयम् प्रयक्षीकृतः।
👉 बटवः : कुमार! कुमार! ‘अश्वोद्योग’ नामक यह आयोजन जनपदों में प्रसिद्ध है, और अब इसे हमने स्वयं प्रत्यक्ष देखा है।
लवः : ‘अश्वोद्योग’ इति नाम पशुसामान्ये संप्रामिके च पद्यते, तद भूत्व-कीदृशः:?
👉 लवः : ‘अश्वोद्योग’ नाम पशुओं के सामान्य व्यवहार और प्रशिक्षण से जुड़ा है। यह वास्तव में कैसा होता है?
बटवः : अये, शृणुताम्—
👉 बटवः : अरे, सुनो—
पश्चात्कुञ्चं वहति विपुलं तच्च धूलोरजस्म दोषेणीयं स भवति, खुरास्यस्य चचार एव।
👉 पीछे चलते हुए घोड़ा बहुत धूल उड़ाता है, जिससे वातावरण दूषित हो जाता है, और उसके खुरों की आवाज़ चारों ओर गूँजती है।
शषाण्यतिन, प्रकृत्या शुक्लपिङ्गकानामभ्राणां किं व्याख्यानंर्वजं स पुनर्दर्शेहेहि यामः।।
👉 उसके शरीर का रंग श्वेत और पीताभ होता है, और वह आकाश में बादलों की तरह दिखाई देता है। यही उसका स्वरूप है।
(इज्जिने हस्तसञ्चालकवृत्तिः) 👉 यहाँ हाथों की गति का संकेत है।
लवः : (सकौकौकोपोधवनियम:) आर्य! पश्चता एषभिनीतोऽस्मि। (इति चरितं परिक्रामति)
👉 लवः : आर्य! इस दृश्य से मैं प्रभावित हुआ हूँ। (ऐसा कहकर वह चारों ओर घूमता है।)
सारांश
इस संवाद में लव और बटव के बीच वार्तालाप है। इसमें अश्वोद्योग (घोड़ों का प्रशिक्षण/आयोजन) का वर्णन किया गया है — घोड़े की चाल, धूल, खुरों की आवाज़ और उसके स्वरूप का चित्रण।
अरुन्धतीजनकोः महत्कौतुकं वत्सस्य।
👉 अरुन्धतीजनकः : इस बालक में बड़ा कौतुक है।
कौसल्या : अरण्यर्थरूपालापीयं तोषिता वयं च।
👉 कौसल्या : वनवासी रूपी इस वार्ता से हम संतुष्ट हैं।
भगवति! जानामि तं पथ्यन्ती वर्ज्यतेव।
👉 हे देवी! मैं जानती हूँ कि वह मार्ग से हटता है।
तस्मादितोऽद्यतो भूत्वा प्रेष्यामहे तावत् पलायमानां दीर्घायुष्मम्।
👉 इसलिए आज से हम उसे भेजेंगे, ताकि वह दीर्घायु होकर पलायमानों का रक्षक बने।
अरुन्धती : अतिजनेन दूरमतिक्रान्तः स चपलः कथं दृष्ट्यते? (प्रविष्य)
👉 अरुन्धती : वह चपल जनसमूह से दूर चला गया है, अब कैसे दिखाई देगा? (प्रवेश करती है)
बटवः : पश्यतु कुमारस्तावदर्चयामि।
👉 बटवः : कुमार देखे, मैं अभी पूजन करता हूँ।
लवः : वृद्धभगवानां चा नूनमस्यवधिकोऽद्यभवः।
👉 लवः : निश्चय ही आज वृद्ध भगवान का प्रभाव अधिक है।
बटवः : कथं ज्ञायते?
👉 बटवः : यह कैसे ज्ञात होता है?
लवः : ननु मूर्खः! पतितमेव हि युवाभ्यां तल्लकाण्डम् किं न पश्यथ?
👉 लवः : अरे मूर्ख! वह प्रसंग तो तुम्हारे सामने ही गिरा है, क्या तुम नहीं देखते?
प्रलेके शतसङ्ख्या: कवलानां दण्डिनो निर्भिषणग्रः रक्षिता:।
👉 प्रलेख में सैकड़ों सैनिकों के समूह सुरक्षित रखे गए हैं।
यदि च विजयस्तत्सूच्यते।
👉 यदि विजय होती है तो वही सूचित होता है।
सारांश
इस संवाद में कौसल्या, अरुन्धती, बटव और लव के बीच वार्तालाप है। इसमें वनवासी जीवन, पलायन, पूजन और विजय की चर्चा की गई है।
बद्व : भो भोः! किं प्रयोजनं योज्यमखस्य परितुष्टः पर्यटति?
👉 बद्व : अरे अरे! यह यज्ञ किस प्रयोजन से किया जा रहा है, और क्यों संतुष्ट होकर घूम रहा है?
लव : (सरस्मृतमात्मतः) ‘अश्वमेध’ इति नाम विश्वविजयचिन्तां क्षत्रियाणां मूर्ज्जलः सर्वक्षत्रणर्भावी महान् उत्कर्षानिनकः। (नेपथ्ये)
👉 लव : ‘अश्वमेध’ नामक यह यज्ञ क्षत्रियों की विश्वविजय की भावना का प्रतीक है। यह महान् उत्कर्ष और सामर्थ्य का सूचक है। (नेपथ्य से कहा गया)
योज्यमखः पाताकम्यथवा वीरशोभना। सत्तलोकैर्वीरस्य दशककुलद्विषः।।
👉 यह यज्ञ ध्वज की भाँति या वीर की शोभा की तरह है। यह वीर को सातों लोकों में प्रतिष्ठित करता है और शत्रु कुलों का नाश करता है।
लव : (सर्गमं) अहो! सर्वं नापमक्षत्राणां।
👉 लव : अहो! यह सब क्षत्रियों के लिए ही है।
बद्व : किंमुच्यते? प्राज्ञः खलु कुमारः।
👉 बद्व : क्या कहा जा रहा है? कुमार तो वास्तव में बुद्धिमान है।
लव : भो भोः! तल्लक्ष्मणस्य पृथिवी! यदवमुष्ठोऽस्यते? (नेपथ्ये)
👉 लव : अरे! यह लक्ष्मण की पृथ्वी है। क्या यह उसके अधिकार में नहीं है? (नेपथ्य से कहा गया)
रे, रे, महाराज प्रति कः क्षत्रियः?
👉 अरे! महाराज के सामने कौन क्षत्रिय है?
लव : धिङ् जालमान! यदि नो सति सन्नद्धे केष्यमेव विभीषिकः। किंमुच्यतेऽस्मिन्धुनां तां पततां हारामि वः।।
👉 लव : धिक्कार है इस जाल में फँसे हुए को! यदि वह सन्नद्ध नहीं है तो यह केवल भय है। इस स्थिति में क्या कहा जाए? मैं उन पतितों का हार ले लेता हूँ।
हे बद्वः! परितुष्ट लोकेऽभ्यञ्जन उपन्यस्तमखस्य एष रोहितानां मध्येऽरो भवतः।
👉 लव : हे बद्व! इस यज्ञ से लोक संतुष्ट हैं। यह अश्वमेध तुम्हारे द्वारा रोहितों के बीच स्थापित किया गया है।
सारांश
इस संवाद में लव और बद्व के बीच वार्तालाप है। इसमें अश्वमेध यज्ञ की महत्ता, क्षत्रियों की विजय भावना, शत्रु‑विनाश और लोकसंतोष का वर्णन किया गया है।
पुरुषः : धिक् चपल! किमुक्तवानसि?
👉 पुरुषः : अरे चंचल! तुमने क्या कह दिया?
तीक्ष्णतरा ह्यायुधश्रेणयः। शिशोरोऽपि दूषां वाचं न सहते।
👉 तीक्ष्ण अस्त्रों की श्रेणियाँ भी शिशु की कोमल वाणी को सहन नहीं कर पातीं।
राजपुत्रध्वजचन्द्रकेतुदुर्दिनः।
👉 राजपुत्र के ध्वज और चन्द्रकेतु से भी दुरदिन का संकेत मिलता है।
सोऽप्यपवर्गं यदवशं न क्षिप्यते हदयोन यावदायाति, तावत् त्वरितमनेन तत्राहं नेनापसर्पत।
👉 जब तक वह प्रहार नहीं होता, तब तक हृदय से अलग नहीं होता; इसलिए मैं शीघ्र वहाँ से हट गया।
बटवः : कुमार! कुतः कृतमभ्येना तर्जनं विक्षारितशरासनः।
👉 बटवः : कुमार! यह धमकी क्यों दी गई, जब धनुष पहले ही चल चुका है?
कुमार-मायूधश्रेणयः। दूरे चाश्रमपदम्। इतस्तदेहि।
👉 कुमार के शस्त्रों की श्रेणियाँ दूर तक पहुँचती हैं। आश्रम का स्थान भी दूर है, वहाँ चलो।
हरिणपुलेजः पलायामहे।
👉 जैसे हरिणी भाग जाती है, वैसे ही हमें भी पलायन करना चाहिए।
लवः : किं नाम विस्मृतानि शस्त्राणि?
👉 लवः : क्या शस्त्रों को सचमुच भुला दिया गया है?
(इति धनुर्रोचयति)
👉 ऐसा कहकर धनुष को सजाता है।
सारांश
इस संवाद में पुरुष, बटव और लव के बीच वार्तालाप है। इसमें शस्त्रों की शक्ति, धमकी, पलायन और धनुष की सज्जा का वर्णन किया गया है।
Conclusion
इस अध्याय के माध्यम से हमें माता-पिता के स्नेह, गुरु के महत्व, विनम्रता तथा आदर्श चरित्र की प्रेरणा प्राप्त होती है। लव के व्यक्तित्व में श्रीराम के गुणों की झलक देखकर कौसल्या और जनक भावविह्वल हो उठते हैं, जिससे पारिवारिक प्रेम और संस्कारों का महत्व स्पष्ट होता है।
आशा है कि Class 12 Sanskrit Chapter 3 Hindi Anuvad आपको अध्याय को गहराई से समझने में सहायता करेगा। परीक्षा की दृष्टि से भी यह अनुवाद अत्यंत उपयोगी है। यदि आप कक्षा 12 संस्कृत के अन्य अध्यायों के हिन्दी अनुवाद, प्रश्नोत्तर एवं व्याख्या पढ़ना चाहते हैं, तो हमारी वेबसाइट पर उपलब्ध अन्य अध्ययन सामग्री भी अवश्य देखें।



