कृतं प्रतिकृतं भूयादेष धर्मः सनातनः — हिन्दी अनुवाद एवं प्रश्नोत्तर
भूमिका का अनुवाद
संस्कृत: रामायणं महाभारतं चेति द्वौ प्रसिद्धौ इतिहास-ग्रन्थौ। महाभारतम् अवलम्ब्य बहवो ग्रन्थाः विरचिताः। तेषु महामहोपाध्यायेन श्रीरङ्गनाथशर्मणा विरचितम् एकचक्रम् इति लघुरूपकम् अन्यतमम्। महाभारते प्रतिपादितः बकासुरवधः अस्य कथावस्तु। अयं पाठ्य-भागः एकचक्रम् इति रूपकस्य तृतीय-चतुर्थाङ्काभ्यां उद्धृतः।
हिन्दी अनुवाद: रामायण और महाभारत — ये दो प्रसिद्ध इतिहास-ग्रंथ हैं। महाभारत के आधार पर अनेक ग्रंथ रचे गए हैं। उनमें से महामहोपाध्याय श्री रंगनाथ शर्मा द्वारा रचित ‘एकचक्रम्’ नामक लघु रूपक (छोटा नाटक) एक है। महाभारत में वर्णित बकासुर-वध ही इसकी कथावस्तु है। यह पाठ्य-भाग ‘एकचक्रम्’ रूपक के तीसरे और चौथे अंक से लिया गया है।
अङ्कद्वयस्य पूर्वकथाप्रसङ्गः (दोनों अंकों की पूर्वकथा)
संस्कृत: पाण्डवाः एकचक्रनगरे कस्यचित् ब्राह्मणस्य गृहे निवसन्ति। गृहस्वामिनः गृहे रोदनध्वनिं श्रुत्वा तत्र गता पाण्डवानां माता कुन्ती रोदनकारणं पृच्छति।
हिन्दी: पांडव एकचक्रनगर में किसी ब्राह्मण के घर में रहते हैं। घर के स्वामी के घर में रोने की आवाज़ सुनकर वहाँ गई हुई पांडवों की माता कुंती रोने का कारण पूछती है।
संस्कृत: ततः शोकाकुलेन परिवारेण सा ज्ञापिता यत् एकचक्रनगरवासिनां नातिदूरस्थितेन बकनाम्ना असुरेण सह सन्धिनियमानुसारं प्रतिदिनं कश्चित् नगरवासी स्वेच्छया असुरस्य भक्ष्यं भवेत्, तद्दिने पर्यायेण तस्यैव ब्राह्मणपरिवारस्य बलिदानस्य वारः आसीत् इति।
हिन्दी: तब शोक-संतप्त परिवार ने उसे बताया कि एकचक्रनगर के निवासियों की, पास ही स्थित बक नामक असुर के साथ हुई संधि के नियमानुसार, प्रतिदिन कोई एक नगरवासी अपनी इच्छा से असुर का भोजन बनता है — उस दिन बारी-बारी से उसी ब्राह्मण परिवार के बलिदान की बारी आई थी।
संस्कृत: तेषां दुःस्थितिं ज्ञात्वा स्वपुत्रेषु एकं बकासुरस्य समीपं प्रेषयामि इति कुन्ती प्रतिज्ञां कृतवती।
हिन्दी: उनकी दुर्दशा जानकर “अपने पुत्रों में से एक को बकासुर के पास भेजूँगी” — ऐसी प्रतिज्ञा कुंती ने की।
संस्कृत: इमं विषयं ज्ञात्वा ब्राह्मणेन कृतस्य उपकारस्य प्रत्युपकारकालः सन्निहितः इति भावयन् भीमः मृष्टान्न-भाण्डसहितः बकासुरस्य समीपं गन्तुम् उद्युक्तः भवति।
हिन्दी: यह बात जानकर, “ब्राह्मण द्वारा किए गए उपकार का बदला चुकाने का समय आ गया है” ऐसा सोचते हुए भीम स्वादिष्ट भोजन के बर्तनों सहित बकासुर के पास जाने के लिए तैयार हो जाता है।
(ततः प्रविशति कुन्ती भीमसेनेन सह) —
तब कुंती भीमसेन के साथ प्रवेश करती है।
संवाद-अनुवाद (पृष्ठ १०९–११३)
| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| कुन्ती: पुत्र! किञ्चित् प्रतिश्रुतं मया प्रतिवेशिने ब्राह्मणाय। | पुत्र! मैंने पड़ोसी ब्राह्मण को कुछ वचन दिया है। |
| भीमः: सम्यगनुष्ठितम्। आतिथेयः किल तत्र भवान् उपकर्ता वसति प्रदानेन। | अच्छा किया। निश्चय ही आतिथ्य-सत्कार करने वाला वह ब्राह्मण वहाँ निवास देकर हम पर उपकार करने वाला है। |
| कुन्ती: आकर्णय, अस्य एकचक्रस्य पुरस्यादूरवर्तिनि पर्वते वसति बकनामा दैत्यः। | सुनो, इस एकचक्रनगर के निकट ही स्थित पर्वत पर बक नामक दैत्य रहता है। |
| भीमः: श्रुतं तस्य दुरात्मनो वृत्तम्। पर्यायक्रमेण तस्मै बलिमाहरन्ति पौराः। | उस दुष्ट का वृत्तांत सुना है। बारी-बारी से नगरवासी उसे भेंट पहुँचाते हैं। |
| कुन्ती: श्वः प्रभाते भवत्यस्य विप्रस्य पर्यायः। | कल सुबह इस ब्राह्मण की बारी है। |
| भीमः: बाढम्। | हाँ, निश्चय ही। |
| कुन्ती: न चैतावत्। मानुषभोजी स राक्षसः श्रूयते। भोज्यसमाहारे मानुषोऽपि तस्मै प्रेषयितव्यः। तस्माद् बालकस्य पिता तपस्वी शोचति। | केवल इतना ही नहीं। वह राक्षस मनुष्यभक्षी सुना जाता है। भोजन-सामग्री के साथ एक मनुष्य को भी उसके पास भेजना पड़ता है। इसीलिए उस बालक का बेचारा पिता शोक कर रहा है। |
| भीमः: विदितमवशिष्टम्। मत्पुत्रेषु कोऽपि प्रेषयिष्यत इति भवत्या प्रतिश्रुतम्। | बाकी बात भी समझ गया। “मेरे पुत्रों में से किसी एक को भेजूँगी” — ऐसा आपने वचन दिया है। |
| कुन्ती: (मौनमवलम्बते) | (मौन धारण कर लेती है) |
द्वितीय भाग (पृष्ठ ११४–११५)
| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| भीमः: मातः! नास्त्यत्र किमप्यनुशोचितव्यम्। क्षत्रियाण्या यदुचितं तदनुष्ठितम्। युक्तोऽयं प्रतिश्रवः। श्रोत्रियोऽयं प्रतिवेशी प्रत्युपकारमर्हति। पश्य — | माँ! इसमें शोक करने योग्य कुछ भी नहीं है। क्षत्राणी ने जो उचित था वही किया है। यह प्रतिज्ञा उचित है। यह वेदपाठी पड़ोसी प्रत्युपकार का पात्र है। देखो — |
| भैक्षप्रदानेन चिरं परैरुपकृता वयम्। कृतं प्रतिकृतं भूयादेष धर्मः सनातनः॥ | भिक्षा देकर दूसरों ने लंबे समय तक हम पर उपकार किया है। किए हुए उपकार का बदला चुकाया जाए — यही सनातन धर्म है। |
| अहमेव बकासुरमभिगमिष्यामि। | मैं ही बकासुर के पास जाऊँगा। |
| कुन्ती: वत्स भीम! अनुरूपमभिहितं भरतवंशप्रदीपेन मम पुत्रेण। भक्ष्यभोज्यादिकं मृष्टान्नं शकटपूरं पूरयित्वा प्रेषणीयं भवति राक्षसाय। तदेतत् सज्जीक्रियतामिति प्रेरयिष्यामि ब्राह्मणकुटुम्बम्। | पुत्र भीम! भरतवंश के दीपक (सर्वश्रेष्ठ) मेरे पुत्र ने उचित ही कहा है। स्वादिष्ट भोजन-सामग्री से पूरी बैलगाड़ी भरकर उस राक्षस को भेजनी होती है। इसे तैयार करने का संदेश मैं ब्राह्मण परिवार को भेजूँगी। |
| भीमः: अहो! प्रियं मे। सज्जीक्रियताम्। अपरमिदं प्रियमनुष्ठितं मे भवत्या। प्रभूतमुपाहरिष्यते भोजनम्। | अहा! यह मुझे प्रिय है। तैयार किया जाए। इसके अतिरिक्त भी आपने मेरे लिए एक प्रिय कार्य किया है। बहुत सारा भोजन लाया जाएगा। |
(ततः प्रविशन्ति युधिष्ठिरादयः) — तब युधिष्ठिर आदि (भाई) प्रवेश करते हैं।
| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| युधिष्ठिरः: (विलोक्य) अये! हर्षेण उत्फुल्लाक्ष इव वत्सो भीमः। | (देखकर) अरे! हर्ष से मानो खिली हुई आँखों वाला बालक भीम है। |
| भीमः: प्रभूतमुपस्थितं मे भोजनम्। | मेरे लिए बहुत सारा भोजन उपस्थित है। |
| अर्जुनः: स्थाने खलु प्रहर्षः औदरिकस्य। | पेटू (भोजनप्रिय) का यह हर्ष उचित ही है। |
| नकुलः: ओष्ठौ स्फुरतः इवाग्रजस्य। | बड़े भाई के होंठ मानो फड़क रहे हैं। |
| भीमः: पश्यत, बाहू अपि स्फुरतः। | देखो, भुजाएँ भी फड़क रही हैं। |
| सहदेवः: अपि हस्तद्वयेन भोक्ष्यसे? | क्या दोनों हाथों से खाओगे? |
| भीमः: तदपि भविष्यति। न केवलं भोजनमुपस्थितम्। आयोधनमपि। | वह भी होगा। केवल भोजन ही नहीं, युद्ध भी उपस्थित है। |
| युधिष्ठिरः: आयोधनमिति। केन? | युद्ध? किसके साथ? |
| भीमः: बकासुरेण। | बकासुर के साथ। |
| युधिष्ठिरः: अम्ब! किमिदानीमुपक्षिप्तम्? | माँ! अभी यह क्या आरंभ हो रहा है? |
| कुन्ती: पुत्रकाः! बकासुरस्य भोजनपरिकल्पनं जानीथ पौराणाम्। तदिदानीं पर्यायपतितं प्रतिवेशिनो ब्राह्मणस्य। | पुत्रो! बकासुर के भोजन की व्यवस्था नगरवासियों की बारी से चलती है, यह तुम जानते ही हो। अब वह बारी पड़ोसी ब्राह्मण की आ पड़ी है। |
| युधिष्ठिरः: ततस्ततः। | फिर आगे बताओ। |
| कुन्ती: स खल्वेकपुत्रस्तपस्वी भृशं परिदेवयते। | वह बेचारा एकमात्र पुत्र वाला ब्राह्मण बहुत विलाप कर रहा है। |
| युधिष्ठिरः: ज्ञातमवशिष्टं मातः! न खलु भवत्या अध्यवसितं समर्थये। यस्य वीरस्य भुजबलमाश्रित्य वयं सुखं शेमहे, यच्च चिन्तयन् दुर्योधनो निद्रां न लभते, तस्य भीमस्य प्रेषणं कथं नु त्वया सङ्कल्पितम्? | बाकी भी समझ गया, माँ! मैं आपके निश्चय का समर्थन नहीं करता। जिस वीर की भुजाओं के बल के सहारे हम सुखपूर्वक रहते हैं, और जिसकी चिंता करते हुए दुर्योधन को नींद नहीं आती, उसी भीम को भेजने का विचार आपने कैसे किया? |
| भीमः: धर्मं विजानता भवता धर्मसङ्ग्रहोऽत्र द्रष्टव्यः। न हि मातुराज्ञा प्रत्यादेशमर्हति। | धर्म को जानने वाले आपको यहाँ धर्म का सार देखना चाहिए। माता की आज्ञा का उल्लंघन उचित नहीं है। |
| युधिष्ठिरः: वत्स भीमसेन! बलवान् मानुषभोजी स राक्षसः इति श्रूयते। | पुत्र भीमसेन! वह राक्षस बलवान और मनुष्यभक्षी सुना जाता है। |
| भीमः: ततः किम्? राक्षसध्वंसी भीमः स्मर्यते। अलं विशङ्कया। हनिष्यामि तं दुरात्मानम्। | तो क्या हुआ? भीम राक्षसों का नाश करने वाला माना जाता है। शंका की आवश्यकता नहीं। मैं उस दुष्ट को मार डालूँगा। |
| अर्जुनः: धनुर्धरोऽहमनुगमिष्यामि। | धनुष लिए हुए मैं तुम्हारे साथ चलूँगा। |
| भीमः: मा मैवम्। न हि खरदंष्ट्रो मृगाधिपः सहायमपेक्षते। | ऐसा मत करो। तीक्ष्ण दाढ़ों वाला सिंह सहायता की अपेक्षा नहीं रखता। |
तृतीय भाग — बकासुर-वध (पृष्ठ ११६–११७)
| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| इमौ हि पीवरौ बाहू सहायौ सहजौ मम। बकं विध्वंसयिष्यामि सिंहः क्षुद्रमृगं यथा॥ | ये मेरी दोनों मोटी भुजाएँ ही मेरी स्वाभाविक सहायक हैं। जिस प्रकार सिंह छोटे पशु को मार डालता है, उसी प्रकार मैं बक का विनाश करूँगा। |
(ततः सर्वैरनुज्ञातः बकं हन्तुकामः भीमः प्रस्थितः) — तब सबकी अनुमति पाकर बक को मारने की इच्छा वाला भीम चल पड़ता है। (ततः प्रविशति भक्ष्य-भोज्यादिक-भाण्ड-पूरित-शकटेन सह) — तब भोजन-सामग्री से भरी बैलगाड़ी के साथ (भीम) प्रवेश करता है।
| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| बकः: मानुषापसद, परिवेषय मे भोजनम्। | हे नीच मनुष्य! मुझे भोजन परोसो। |
| भीमः: सर्वं परिवेषितं मदीय-जठरस्थाय भगवते हुताशनाय। त्वां धर्मदूषणं हन्तुम् आगतोऽहम्। | सारा परोसा हुआ भोजन मेरे पेट में स्थित अग्निदेव के लिए है। मैं तुझे, धर्म को दूषित करने वाले को, मारने आया हूँ। |
| बकः: कथं, कः खलु अधर्मः मया सेवितः? (सहासमुदरं परिमृजन्) | क्या कहा? मैंने कौन-सा अधर्म किया है? (हँसते हुए अपना पेट सहलाते हुए) |
| भीमः: नरभक्षणम्। | मनुष्यों को खाना (यही अधर्म है)। |
| बकः: नरभक्षणं नाम मांसाशिनां राक्षसानां धर्मः। | मनुष्यों को खाना तो मांसभक्षी राक्षसों का धर्म है। |
| भीमः: नररक्षणं नाम भूमिपालानां क्षत्रियाणां धर्मः। | मनुष्यों की रक्षा करना पृथ्वी के रक्षक क्षत्रियों का धर्म है। |
| बकः: क्षत्रियोऽसि? | क्या तू क्षत्रिय है? |
| भीमः: बाढम्, क्षत्रियोऽस्मि। | हाँ, मैं क्षत्रिय हूँ। |
| रक्षिता साधुलोकानां वरिष्ठो बाहुशालिनाम्। निषूदको हिडिम्बस्य मृत्युश्चास्मि भवादृशाम्॥ | मैं सज्जनों का रक्षक, बलशालियों में श्रेष्ठ, हिडिंब का वध करने वाला और तुम्हारे जैसों के लिए मृत्युरूप हूँ। |
| बकः: अहह! मम मित्रस्य हिडिम्बस्य हन्ता कौन्तेयो भवान्? | अरे! मेरे मित्र हिडिंब का वध करने वाले आप कुंती-पुत्र हैं? |
| भीमसेनः: कामम्! कौन्तेयोऽस्मि भीमसेनः। | निश्चय ही! मैं कुंती-पुत्र भीमसेन हूँ। |
| बकः: इदमस्ति मे भागधेयम्। चिरान्विष्टो मृगः स्वयमुत्पतितो व्याघ्रगह्वरम्। श्लाघनीयोऽसि मे रिपुः। | यह मेरा सौभाग्य है। बहुत समय से खोजा गया शिकार स्वयं ही बाघ की गुफा में आ गिरा है। तू मेरा प्रशंसनीय शत्रु है। |
| भीमसेनः: इदं मे स्वस्त्ययनं यन्मां श्लाघनीयं रिपुं मन्यसे। अनुवर्तस्व ते मित्रं हिडिम्बम्। | मेरे लिए यह मंगलकारी है कि तू मुझे प्रशंसनीय शत्रु मानता है। अपने मित्र हिडिंब के पीछे चला जा (अर्थात् मर जा)। |
| बकः: वाचाट! क्षत्रियडिम्भ, गृहाण शस्त्रम्। शातयामि ते दर्पम्। | हे बकवादी! क्षत्रिय-बालक, अस्त्र उठा। मैं तेरा घमंड चूर कर दूँगा। |
| भीमसेनः: अलं शस्त्रग्रहणविडम्बनेन, त्वन्मस्तकास्थिभिद्रोऽस्ति ममैष मुष्टिः। | अस्त्र पकड़ने के दिखावे की आवश्यकता नहीं, मेरी यह मुट्ठी ही तेरी खोपड़ी की हड्डियाँ तोड़ने वाली है। |
(उभौ प्रहरतः। मल्लयुद्धं प्रवर्तते। हतः पतति बकः।) — दोनों प्रहार करते हैं। मल्लयुद्ध होता है। मारा गया बक गिर पड़ता है।
श्लोकों का भावार्थ
१. वयं नागरिकैः बहुकालं भिक्षा-प्रदानेन पोषिताः। उपकृतमेतत् प्रत्युपकृतं भवेत् इति एष: शाश्वतः धर्मः। हिन्दी: हम नगरवासियों द्वारा दीर्घकाल तक भिक्षा देकर पाले-पोसे गए हैं। किए गए उपकार का बदला चुकाया जाना चाहिए — यही शाश् धर्म है।
२. एतौ हि, पुष्टौ, भुजौ, मम सहजातौ उपकारकौ। सिंहः तुच्छं वन्यप्राणिनमिव, अहं, बकनामानम् असुरं विनाशयिष्यामि। हिन्दी: ये दोनों पुष्ट भुजाएँ ही मेरी जन्मजात सहायक हैं। जैसे सिंह किसी तुच्छ वनपशु को मार डालता है, वैसे ही मैं बक नामक असुर का विनाश करूँगा।



