class 9 sanskrit chapter 10 hindi translation | णमो अरिहन्ताणम्
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class 9 sanskrit chapter 10 hindi translation | णमो अरिहन्ताणम्

by | Aug 25, 2026 | 0 comments

णमो अरिहन्ताणम् — हिन्दी अनुवाद एवं प्रश्नोत्तर

अनुवाद (अनुच्छेदवार)

संस्कृत: आसीत् युगानाम् आरम्भे प्रजानां प्रियः नाभिनामकः कश्‍चन महाराजः। सः राजनीतौ युद्धतन्त्रे प्रशासनादिषु च समर्थः। तस्य पत्नी मरुदेवी बुद्धिमती करुणाशालिनी च। तयोः एव प्रियपुत्रः ऋषभः। ऋषभः सर्वगुणसम्पन्नः, अधीतविद्यः, राजनीतिज्ञश्च आसीत्। यौवनेन विलसन्तं तं राजकुमारं वीक्ष्य नाभिः तस्मै राज्यभारं समर्पयितुम् अचिन्तयत्।

हिन्दी: युगों के आरंभ में प्रजा का प्रिय, नाभि नामक एक महाराजा थे। वे राजनीति, युद्धतंत्र और प्रशासन आदि में कुशल थे। उनकी पत्नी मरुदेवी बुद्धिमती और दयालु थीं। उन दोनों का प्रिय पुत्र ऋषभ था। ऋषभ सभी गुणों से संपन्न, विद्वान और राजनीतिज्ञ था। यौवन से सुशोभित उस राजकुमार को देखकर नाभि ने उसे राज्यभार सौंपने का विचार किया।

संस्कृत: अथैकदा समाजे दुर्भिक्षादयः समस्याः समुदभवन्। जनेषु परस्परं विद्वेषादयः भावनाः आविरभवन्। तदा नाभिः “अयं कालः ऋषभस्य राजनीतेः परीक्षार्थं सुयोग्यः” इति मन्यमानः तस्मै राज्यं समर्पितवान्। ऋषभः यदा राजा अभवत् तदा सः आदौ जनानां समस्याः काः, दुर्भिक्षस्य कारणं किं, जनेषु कुतः परस्परं विद्वेषः, समस्यानां समाधानोपायाः के इत्यादिषु विषयेषु चिन्तनं कृतवान्।

हिन्दी: तब एक बार समाज में अकाल आदि समस्याएँ उत्पन्न हो गईं। लोगों में आपस में द्वेष आदि भावनाएँ पैदा हो गईं। तब नाभि ने “यह समय ऋषभ की राजनीति की परीक्षा के लिए उपयुक्त है” ऐसा मानकर उसे राज्य सौंप दिया। जब ऋषभ राजा बने, तब उन्होंने सबसे पहले — लोगों की समस्याएँ क्या हैं, अकाल का कारण क्या है, लोगों में आपस में द्वेष क्यों है, समस्याओं के समाधान के उपाय क्या हैं — इन विषयों पर चिंतन किया।

संस्कृत: तेन काचित् स्पष्टकल्पना प्राप्ता यत् जनानाम् आलस्यं, कृषिकार्ये न्यूनता, प्रजासु उत्पादनक्षमतायाः अभावः चेत्येतादृश्यः मूलसमस्याः सन्ति इति। अतः सः मूलसमस्यानां परिष्काराय जनानां सुखमय-जीवनाय च विविधाः योजनाः रचितवान्। विशेषरूपेण कृषिकार्यं, विविधपदार्थैः भोजननिर्माणं, तन्तुभिः वस्त्रनिर्माणं, गवाम् अश्वादीनां पशूनां पालनं चेत्यादीनि जीवनकौशलानि प्रशिक्षितवान्। काष्ठैः धातुभिः शिलाभिः च गृहोपयोगिनां वस्तूनां निर्माणं, पात्रनिर्माणं, गृहनिर्माणं, नगरनिर्माणादिकं च प्रशिक्षितवान्।

हिन्दी: उन्हें एक स्पष्ट समझ प्राप्त हुई कि लोगों का आलस्य, कृषि-कार्य में कमी, प्रजा में उत्पादन-क्षमता का अभाव — ऐसी ये मूल समस्याएँ हैं। इसलिए उन्होंने इन मूल समस्याओं के समाधान और लोगों के सुखमय जीवन के लिए विविध योजनाएँ बनाईं। विशेष रूप से कृषि-कार्य, विभिन्न पदार्थों से भोजन बनाना, धागों से वस्त्र बनाना, गाय-घोड़े आदि पशुओं का पालन आदि जीवन-कौशल सिखाए। लकड़ी, धातु और पत्थरों से घरेलू वस्तुओं का निर्माण, बर्तन बनाना, घर बनाना, नगर बनाना आदि भी सिखाया।

संस्कृत: तेन क्रमशः जनाः सक्रियाः अभवन् जीवनपद्धतिं च परिवर्तितवन्तः। क्रमशः जनानाम् आर्थिकस्थितिः अपि सुदृढा जाता। जनाः स्वयमेव गृहाणां विविधभोज्यपदार्थानां नित्योपयोगिवस्तूनां च निर्माणं कर्तुम् आरब्धवन्तः। कृषिकार्याणि अपि प्रचुरतया आरब्धानि। तेन जनानां समस्याः स्वयमेव परिहृताः, राज्यं पुनः सुभिक्षं चाभवत्।

हिन्दी: इससे धीरे-धीरे लोग सक्रिय हो गए और अपनी जीवन-पद्धति भी बदल दी। धीरे-धीरे लोगों की आर्थिक स्थिति भी सुदृढ़ हो गई। लोग स्वयं ही घरों, विविध भोजन-पदार्थों और नित्य उपयोग की वस्तुओं का निर्माण करने लगे। कृषि-कार्य भी बड़े पैमाने पर आरंभ हो गए। इससे लोगों की समस्याएँ स्वयं ही दूर हो गईं, और राज्य फिर से समृद्ध (सुभिक्ष) हो गया।

श्लोक: प्रजासुखे सुखं राज्ञः प्रजानां च हिते हितम्। नात्मप्रियं हितं राज्ञः प्रजानां तु प्रियं हितम्॥

हिन्दी: प्रजा के सुख में ही राजा का सुख है, और प्रजा के हित में ही (राजा का) हित है। राजा का हित अपनी प्रिय वस्तु में नहीं है, बल्कि प्रजा को जो प्रिय और हितकर हो वही (राजा का असली) हित है।

संस्कृत: ऋषभः जनानां जीवने शान्तिं सुरक्षां न्यायिकव्यवस्थां च पुनः सुदृढां कृतवान्। एवम् ऋषभस्य दक्षशासनेन कौशलेन च विनितानाम्नः नगरस्य निर्माणम् अभवत्। समाजस्य उत्कर्षेण सः जनानां मनस्सु सुप्रतिष्ठितं स्थानं प्राप्तवान्। अतः तं प्रजाः प्रेम्णा राजा ऋषभदेवः इति कथयन्ति स्म। ऋषभदेवः समाजस्य उत्कर्षेण सह साम्राज्यस्यापि विस्तारं कृतवान्। एतादृशस्य महाराजस्य पुत्राः अपि शौर्येण पराक्रमेण बुद्धिबलेन च विश्वप्रसिद्धाः आसन्। तादृशेषु शते पुत्रेषु विशेषरूपेण भरतः बाहुबलिः च अत्यन्तं सुविख्यातौ। तथैव ऋषभस्य पुत्रीषु ब्राह्मी सुन्दरी चेति द्वे कन्ये अपि गणितादिषु शास्त्रेषु प्रवीणे प्रसिद्धे च आस्ताम्।

हिन्दी: ऋषभ ने लोगों के जीवन में शांति, सुरक्षा और न्याय-व्यवस्था को फिर से मजबूत किया। इस प्रकार ऋषभ के कुशल शासन और दक्षता से ‘विनिता’ नामक नगर का निर्माण हुआ। समाज की उन्नति से उन्होंने लोगों के मन में सुदृढ़ स्थान प्राप्त किया। इसलिए प्रजा प्रेमपूर्वक उन्हें राजा ऋषभदेव कहने लगी। ऋषभदेव ने समाज की उन्नति के साथ-साथ साम्राज्य का भी विस्तार किया। ऐसे महाराज के पुत्र भी शौर्य, पराक्रम और बुद्धिबल में विश्वप्रसिद्ध थे। उन सौ पुत्रों में विशेष रूप से भरत और बाहुबलि अत्यंत प्रसिद्ध थे। इसी प्रकार ऋषभ की पुत्रियों में ब्राह्मी और सुंदरी नामक दो कन्याएँ भी गणित आदि शास्त्रों में प्रवीण और प्रसिद्ध थीं।

संस्कृत: जैनसम्प्रदायानुगुणं ‘ब्राह्मीलिप्याः’ विकास: ब्राह्मीद्वारैव कृता इति श्रूयते। तस्यामेव लिप्यां शिलालेखाः उपलभ्यन्ते एवं सर्वोन्मुखसमृद्ध्या ऋषभदेवः जीवने प्राप्तानन्दः परमसुखी च आसीत्। परं को वा जानाति विधिलिखितम्। ऋषभदेवस्यापि जीवने काचित् तादृशी घटना संवृत्ता यया तस्य जीवनमेव परिवर्तितम्। उच्यते हि —

हिन्दी: जैन परंपरा के अनुसार ‘ब्राह्मी लिपि’ का विकास ब्राह्मी द्वारा ही किया गया, ऐसा सुना जाता है। उसी लिपि में शिलालेख प्राप्त होते हैं। इस प्रकार सर्वांगीण समृद्धि से ऋषभदेव जीवन में आनंद पाकर परम सुखी थे। परंतु भाग्य में लिखे को कौन जानता है? ऋषभदेव के जीवन में भी एक ऐसी घटना घटी जिससे उनका जीवन ही बदल गया। कहा भी जाता है —

श्लोक: दैवाधीनं जगत्सर्वं जन्मकर्मशुभावहम्। संयोगश्च वियोगश्च न च दैवात्परं बलम्॥

हिन्दी: संपूर्ण जगत भाग्य के अधीन है, जन्म और कर्म शुभ फल लाने वाले होते हैं। संयोग और वियोग (भी भाग्य के अधीन हैं); भाग्य से बढ़कर कोई शक्ति नहीं है।

संस्कृत: एकदा ऋषभदेवः राजप्रासादे नृत्यकलाप्रदर्शनम् आयोजितवान्। तत्र आगता काचित् नर्तकी नृत्यकलां प्रदर्शयन्ती सहसा भूमौ पतित्वा मृता। अनया घटनया ऋषभदेवस्य मनः सहसा विक्षुब्धम् अभवत्। कथं काचित् आरोग्यवती स्त्री सहसा मरणं प्राप्तवती, किं नाम जीवनम्, कथं जीवनीयम्, इत्यादयः अनेके प्रश्नाः तस्य बुद्धौ आविरभवन्। इह संसारे किमपि शाश्वतं नास्ति, इदं सुखं स्थायि नास्ति इति विचिन्त्य स्थिरसुखस्य प्राप्त्यर्थं सः सर्वमपि परित्यज्य भिक्षुरूपेण प्रस्थितवान्।

हिन्दी: एक बार ऋषभदेव ने राजमहल में नृत्यकला का प्रदर्शन आयोजित किया। वहाँ आई हुई कोई नर्तकी नृत्यकला दिखाते हुए अचानक भूमि पर गिरकर मर गई। इस घटना से ऋषभदेव का मन अचानक व्याकुल हो गया। “कैसे कोई स्वस्थ स्त्री अचानक मृत्यु को प्राप्त हो गई, जीवन क्या है, कैसे जीना चाहिए” — ऐसे अनेक प्रश्न उनकी बुद्धि में उठने लगे। “इस संसार में कुछ भी शाश्वत नहीं है, यह सुख स्थायी नहीं है” — ऐसा सोचकर स्थिर सुख की प्राप्ति के लिए उन्होंने सब कुछ त्यागकर भिक्षु रूप में प्रस्थान किया।

संस्कृत: स्वस्य विशालं साम्राज्यं स्वपुत्रेषु विभक्तवान्। विशेषतया ‘विनिता’ राज्यं भरताय तक्षशिलां बाहुबलये च समर्प्य जीवनस्य परमसत्यम् अन्वेष्टुं प्रस्थितोऽयं महामुनिः। तम् अनेके जनाः शिष्यरूपेण अनुसृतवन्तः। ऋषभदेवः तदारभ्य अरण्येषु मौनेन ध्यानं निरन्तरम् अध्ययनं च करोति स्म। सः अध्ययने गभीरध्याने च तथा लीनः भवति स्म येन सः भोजनपानादिकमपि विस्मृत्य बहुकालं यावत् स्वाभाविकरूपेण निराहारम् अकरोत्। परं तस्य अनुयायिनः तथा निराहारं स्थातुं कष्टम् अनुभवन्ति स्म। किन्तु ते ऋषभदेवं त्यक्त्वा गन्तुमपि न इच्छन्ति स्म। ते अरण्ये विद्यमानेभ्यः वृक्षेभ्यः फलानि शाकानि वा चित्वा जीवनं यापयन्ति स्म।

हिन्दी: उन्होंने अपना विशाल साम्राज्य अपने पुत्रों में बाँट दिया। विशेष रूप से ‘विनिता’ राज्य भरत को और तक्षशिला बाहुबलि को सौंपकर यह महामुनि जीवन के परम सत्य की खोज में निकल पड़े। अनेक लोग उनके पीछे शिष्य रूप में चल पड़े। ऋषभदेव तब से वनों में मौनपूर्वक निरंतर ध्यान और अध्ययन करने लगे। वे अध्ययन और गहरे ध्यान में इतने लीन हो जाते थे कि भोजन-पानी आदि भी भूलकर लंबे समय तक स्वाभाविक रूप से बिना भोजन के रह जाते थे। परंतु उनके अनुयायियों को इस प्रकार बिना भोजन रहना कठिन लगता था। फिर भी वे ऋषभदेव को छोड़कर जाना नहीं चाहते थे। वे वन में उपलब्ध वृक्षों से फल या साग तोड़कर अपना जीवन चलाते थे।

संस्कृत: कदाचित् तेषाम् एतादृशं व्यवहारं दृष्ट्वा जैनसन्यासिनः वृक्षेभ्यः फलानि शाकानि वा न चिनुयुः इति बोधनार्थं स्वयं भिक्षार्थं प्रस्थितः। अनुयायिनः अपि तस्य आचरणेन प्रभाविताः सन्तः भिक्षार्थं गताः। ग्रामेषु प्रतिगृहं गत्वा भिक्षां प्राप्य जीवनं निर्वर्तयन्ति स्म। परम् ऋषभः पूर्वं भोजनार्थं मौनेन भिक्षायाचनं करणीयमिति मौनेन प्रतिगृहं भिक्षायाचनम् आरब्धवान्। परं तत्रत्याः जनाः तेषां प्रियं महाराजं दृष्ट्वा भिक्षायां किं दातव्यमिति सम्भ्रान्ताः सन्तः तस्मै आभरणानि अनर्घवस्तूनि च यच्छन्ति स्म। परं भिक्षायां भोजनपदार्थः देयः इति न केनापि चिन्तितम्। फलतः ऋषभदेवस्य दिने दिने सकष्टम् उपवासः करणीयः आपतितम्। कदाचित् ऋषभदेवः भोज्यपदार्थानाम् अभावे चतुःशतं दिनानि नैरन्तर्येण उपवासं कृतवान्।

हिन्दी: एक बार उनका ऐसा (कठिन) आचरण देखकर, जैन संन्यासी वृक्षों से फल या साग न तोड़ें — यह सिखाने के लिए स्वयं भिक्षा माँगने निकल पड़े। उनके आचरण से प्रभावित होकर अनुयायी भी भिक्षा माँगने गए। गाँवों में घर-घर जाकर भिक्षा प्राप्त कर अपना जीवन चलाते थे। परंतु ऋषभ ने “पहले भोजन के लिए मौनपूर्वक भिक्षा माँगनी चाहिए” — यह सोचकर मौन रहते हुए घर-घर भिक्षा माँगना आरंभ किया। परंतु वहाँ के लोग अपने प्रिय महाराज को देखकर भिक्षा में क्या दें — यह सोचकर विस्मित हो गए, और उन्हें आभूषण तथा अनमोल वस्तुएँ देने लगे। परंतु भिक्षा में भोजन-सामग्री देनी चाहिए — यह किसी ने नहीं सोचा। फलस्वरूप ऋषभदेव को प्रतिदिन कष्टपूर्वक उपवास करना पड़ा। एक बार भोजन-सामग्री के अभाव में ऋषभदेव ने लगातार चार सौ दिनों तक उपवास किया।

संस्कृत: एकदा पर्यटनावसरे सः हस्तिनापुरस्य समीपे स्थितस्य इक्षुक्षेत्रस्य पार्श्वमार्गात् गच्छति स्म। तच्च इक्षुक्षेत्रं तस्यैव प्रपौत्रस्य श्रेयांसस्य आसीत्। सः श्रेयांसः प्रपितामहाय पानार्थम् इक्षुरसं दत्तवान्। अनेन ऋषभदेवस्य दीर्घकालिकः उपवासः समाप्तः। तच्च वैशाखमासस्य अक्षयतृतीया-दिनम् आसीत्। अतः जैनसम्प्रदाये ‘वर्षतपपारणामहोत्सवः’ अधुनापि गुजराते पदलिप्तपुरम् (पालीताणा) उत्तरप्रदेशे हस्तिनापुरं चेत्यादिषु पवित्रतीर्थेषु आचर्यते। अत्र त्रयोदशमासानां वैकल्पिकदिनेषु उपवासं कुर्वन्ति। अन्ते अक्षयतृतीयादिने इक्षुरसेन उपवासस्य समापनं कुर्वन्ति।

हिन्दी: एक बार भ्रमण के अवसर पर वे हस्तिनापुर के समीप स्थित गन्ने के खेत के किनारे के रास्ते से जा रहे थे। वह गन्ने का खेत उन्हीं के प्रपौत्र (परपोते) श्रेयांस का था। उस श्रेयांस ने अपने प्रपितामह (परदादा) को पीने के लिए गन्ने का रस दिया। इससे ऋषभदेव का दीर्घकालीन उपवास समाप्त हुआ। यह वैशाख मास की अक्षय तृतीया का दिन था। इसलिए जैन परंपरा में ‘वर्षतप पारणा महोत्सव’ आज भी गुजरात के पदलिप्तपुर (पालीताणा), उत्तर प्रदेश के हस्तिनापुर आदि पवित्र तीर्थों में मनाया जाता है। यहाँ तेरह महीनों के वैकल्पिक दिनों में उपवास करते हैं। अंत में अक्षय तृतीया के दिन गन्ने के रस से उपवास पूरा करते हैं।

संस्कृत: एवं दीर्घकालिकोपवासेन निरन्तराध्ययनेन कठोरतपसा च ऋषभदेवः फाल्गुनमासस्य कृष्णपक्षे एकादश्यां तिथौ प्रयागराजे अक्षयवटवृक्षस्य अधः केवलज्ञानं प्राप्तवान्। अयमेव जैनसम्प्रदाये आदिमः तीर्थङ्करः प्रभुः नाथः इत्यतः ‘आदिनाथः’ इति ख्यात:। ऋषभदेवः जनानां मार्गदर्शनार्थं भिक्षुः भिक्षुणी श्रावकः श्राविका चेति क्रमं रचितवान्। स एव क्रमः जैनसङ्घः इति प्रसिद्धः वर्तते।

हिन्दी: इस प्रकार दीर्घकालीन उपवास, निरंतर अध्ययन और कठोर तप से ऋषभदेव ने फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को प्रयागराज में अक्षयवट वृक्ष के नीचे केवलज्ञान प्राप्त किया। यही जैन परंपरा के प्रथम तीर्थंकर, “प्रभु/नाथ” होने के कारण ‘आदिनाथ’ के नाम से प्रसिद्ध हैं। ऋषभदेव ने लोगों के मार्गदर्शन के लिए भिक्षु, भिक्षुणी, श्रावक और श्राविका — यह क्रम (व्यवस्था) बनाई। वही व्यवस्था ‘जैन संघ’ के नाम से प्रसिद्ध है।

संस्कृत: तेषां परमो मन्त्रः नवकारमन्त्रः इति प्रसिद्धः यच्च प्राकृतभाषायां वर्तते — “णमो अरिहन्ताणं, णमो सिद्धाणं, णमो आयरियाणं, णमो उवज्झायाणं, णमो लोए सव्वसाहूणं”

हिन्दी: उनका सर्वोच्च मंत्र ‘नवकार मंत्र’ के नाम से प्रसिद्ध है, जो प्राकृत भाषा में है — “मैं अरिहंतों को नमस्कार करता हूँ, सिद्धों को नमस्कार करता हूँ, आचार्यों को नमस्कार करता हूँ, उपाध्यायों को नमस्कार करता हूँ, लोक के सभी साधुओं को नमस्कार करता हूँ।”

संस्कृत: अस्य अर्थः भवति नमामि अरिहन्तॄन्, नमामि सिद्धान्, नमामि आचार्यान्, नमामि उपाध्यायान्, नमामि लोके सर्वसाधून् इति। अयं सर्वेषां जैनानां परमपावनः मन्त्रः अस्ति। प्रतिवर्षम् अप्रैल-मासस्य नवमे दिनाङ्के जैनजनाः सामूहिकरूपेण अस्य मन्त्रस्य जपादिकं कृत्वा उत्सवम् आचरन्ति। अतः अस्य दिवसस्य ‘नवकारमहामन्त्रदिवसः’ इति ख्यातिः वर्तते। एषः मन्त्रः पञ्चपरमेष्ठिभ्यः (अरिहन्तारः, सिद्धाः, आचार्याः, उपाध्यायाः, सर्वे साधवः च) प्रणामं समर्पयति। ‘वसुधैवकुटुम्बकम्’ इत्यस्य अनुरूपेण विश्वशान्त्यै कोटिशः जनैः गीयमानः परमोमन्त्रः अयं णमोकारमन्त्रः।

हिन्दी: इसका अर्थ है — “मैं अरिहंतों को, सिद्धों को, आचार्यों को, उपाध्यायों को और लोक के सभी साधुओं को नमस्कार करता हूँ।” यह सभी जैनों का परम पवित्र मंत्र है। प्रतिवर्ष अप्रैल माह की नवमी तिथि को जैन लोग सामूहिक रूप से इस मंत्र का जप आदि करके उत्सव मनाते हैं। इसलिए इस दिन को ‘नवकार महामंत्र दिवस’ के नाम से जाना जाता है। यह मंत्र पंच-परमेष्ठियों (अरिहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय और सभी साधु) को प्रणाम करता है। ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के अनुरूप विश्व-शांति के लिए करोड़ों लोगों द्वारा गाया जाने वाला यह परम मंत्र ही ‘णमोकार मंत्र’ है।

संस्कृत: जैनमतस्य प्रमुखाः सिद्धान्ताः — अहिंसा परमो धर्मः (मनसा, वाचा, कर्मणा च अहिंसापालनम्), अनेकान्तवादः (सत्यस्य अनेके पक्षाः भवन्ति), स्याद्वादः (प्रत्येकं वचनं सापेक्षं “स्यादिति” रूपेण ग्राह्यम्), अपरिग्रहः (आवश्यकात् अधिकं संग्रहः न करणीयः) इत्यादयः। एतेषां दर्शनानां मध्ये — सम्यग्दर्शनम्, सम्यग्ज्ञानम्, सम्यक्चरित्रम् इति त्रीणि रत्नानि उच्यन्ते। तथा च प्राणिमात्रहिताय पञ्चमहाव्रतानि — सत्यम्, अहिंसा, अस्तेयम्, अपरिग्रहः, ब्रह्मचर्यं च आचरितुं कल्याणकरम् इति निगद्यते।

हिन्दी: जैन मत के प्रमुख सिद्धांत हैं — अहिंसा परम धर्म है (मन, वचन और कर्म से अहिंसा का पालन करना), अनेकांतवाद (सत्य के अनेक पक्ष होते हैं), स्याद्वाद (प्रत्येक कथन को सापेक्ष रूप से “स्यात्” अर्थात “शायद” के रूप में समझना चाहिए), अपरिग्रह (आवश्यकता से अधिक संग्रह नहीं करना चाहिए) इत्यादि। इन दर्शनों में सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चरित्र — ये तीन रत्न कहे जाते हैं। साथ ही सभी प्राणियों के हित के लिए पाँच महाव्रतों — सत्य, अहिंसा, अस्तेय (चोरी न करना), अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य — का पालन करना कल्याणकारी कहा गया है।

अत्र इदम् अवधेयम् — प्राकृतभाषा (अनुवाद सहित)

संस्कृत: भारते भाषासम्पदा अतीव समृद्धा अस्ति। कस्मिंश्‍चित् कालघट्टे अनेकाः प्राकृतभाषाः सामान्यजनानां संवादोपयोगिन्यः आसन्। प्राकृतभाषाः — आर्षप्राकृतम्, मागधीप्राकृतम्, शौरसेनीप्राकृतम्, महाराष्ट्रप्राकृतम्, पैशाचिप्राकृतम्, चूलिकाप्राकृतम्, अपभ्रंशप्राकृतम् इत्यादयः। जैनागमाः अर्धमागधीभाषायां लिखिताः। महाराष्ट्रप्राकृते महाकविः हालः गाथासप्तशती इति सुप्रसिद्धं काव्यं लिखितवान्। शौरसेनीप्राकृते बहवः नाट्यग्रन्थाः रचिताः सन्ति। अनेन ज्ञायते यत् प्राकृतभाषा न केवलं संवादोपयोगिनी अपितु उच्चकोटिसाहित्यस्य वाहिनी आसीत्। एवं संस्कृतं यदि स्रोतस्विनी नदी, तर्हि प्राकृतं तस्या एव सरलः प्रवाहः अस्ति। उभयोर्मध्ये अविच्छिन्नः सम्बन्धः अस्ति।

हिन्दी: भारत में भाषा-संपदा अत्यंत समृद्ध है। किसी काल-खंड में अनेक प्राकृत भाषाएँ सामान्य जनों के आपसी संवाद के लिए उपयोगी थीं। प्राकृत भाषाएँ हैं — आर्ष प्राकृत, मागधी प्राकृत, शौरसेनी प्राकृत, महाराष्ट्र प्राकृत, पैशाचिक प्राकृत, चूलिका प्राकृत, अपभ्रंश प्राकृत इत्यादि। जैन आगम (धर्मग्रंथ) अर्धमागधी भाषा में लिखे गए हैं। महाराष्ट्र प्राकृत में महाकवि हाल ने ‘गाथासप्तशती’ नामक प्रसिद्ध काव्य लिखा। शौरसेनी प्राकृत में अनेक नाट्य-ग्रंथ रचे गए हैं। इससे पता चलता है कि प्राकृत भाषा केवल संवाद के लिए ही नहीं, बल्कि उच्च कोटि के साहित्य की वाहिनी भी थी। जिस प्रकार संस्कृत यदि एक बहती हुई महान नदी है, तो प्राकृत उसी का सरल प्रवाह है। दोनों के बीच अटूट संबंध है।

(पाठ्यपुस्तक में इसके बाद संस्कृत-वाक्यों का प्राकृत अनुवाद दर्शाने वाली तालिका है — जैसे “अहं विद्यालयं गच्छामि” का प्राकृत रूप “अहं विज्जालयं गच्छामि/गच्छमि/गच्छेमि/गच्छं” होता है — यह तालिका स्वयं में द्विभाषिक (संस्कृत-प्राकृत) है, अतः पृथक् हिन्दी अनुवाद अनावश्यक है।)

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