पञ्चमः पाठः — सुभाषितानि (शेमुषी भाग-2, कक्षा 10) — अभ्यास प्रश्नोत्तर (संस्कृत व हिन्दी)
पाठ-परिचय (Extra Info)
प्रस्तुत पाठ विविध ग्रन्थों से संकलित दस सुभाषितों का संग्रह है। संस्कृत साहित्य में सार्वभौमिक सत्य को प्रकाशित करने वाली अर्थगाम्भीर्ययुता पद्यमयी प्रेरणात्मिका रचना ‘सुभाषित’ कही जाती है। यह पाठांश परिश्रम का महत्त्व, क्रोध का दुष्प्रभाव, सामाजिक महत्त्व, सभी वस्तुओं की उपादेयता और बुद्धि की विशेषता जैसे विषयों को प्रकाशित करता है।
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💬 Talk to a Counsellor Class 10 • Expert Faculty • Regular Tests • Doubt Supportदस सुभाषित श्लोक — मूल एवं हिन्दी अर्थ (Extra: All 10 Verses with Meaning)
आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः।
नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति॥1॥
हिन्दी अर्थ: आलस्य ही मनुष्यों का शरीर में स्थित महान् शत्रु है। उद्यम (परिश्रम) के समान कोई मित्र नहीं है, जिसे करके मनुष्य कभी दुखी नहीं होता।
गुणी गुणं वेत्ति न वेत्ति निर्गुणो,
बली बलं वेत्ति न वेत्ति निर्बलः।
पिको वसन्तस्य गुणं न वायसः,
करी च सिंहस्य बलं न मूषकः॥2॥
हिन्दी अर्थ: गुणी व्यक्ति गुण को जानता है, निर्गुण व्यक्ति गुण को नहीं जानता। बलवान बल को जानता है, निर्बल बल को नहीं जानता। कोयल वसन्त के गुण को जानती है, कौआ नहीं। हाथी सिंह के बल को जानता है, चूहा नहीं जानता।
निमित्तमुद्दिश्य हि यः प्रकुप्यति,
ध्रुवं स तस्यापगमे प्रसीदति।
अकारणद्वेषि मनस्तु यस्य वै,
कथं जनस्तं परितोषयिष्यति॥3॥
हिन्दी अर्थ: जो किसी कारण को लेकर क्रोधित होता है, वह उस कारण के दूर होते ही अवश्य प्रसन्न हो जाता है। परन्तु जिसका मन बिना कारण ही द्वेष करने वाला है, उसे लोग कैसे संतुष्ट करेंगे?
उदीरितोऽर्थः पशुनापि गृह्यते,
हयाश्च नागाश्च वहन्ति बोधिताः।
अनुक्तमप्यूहति पण्डितो जनः,
परेङ्गितज्ञानफला हि बुद्धयः॥4॥
हिन्दी अर्थ: कहा हुआ अर्थ तो पशु भी ग्रहण कर लेते हैं, समझाए जाने पर घोड़े और हाथी भी बोझ ढोते हैं। किन्तु बुद्धिमान व्यक्ति बिना कहे हुए तथ्य को भी समझ लेता है, क्योंकि बुद्धि का फल दूसरे के संकेत को जान लेना ही है।
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क्रोधो हि शत्रुः प्रथमो नराणां,
देहस्थितो देहविनाशनाय।
यथास्थितः काष्ठगतो हि वह्निः,
स एव वह्निर्दहते शरीरम्॥5॥
हिन्दी अर्थ: क्रोध ही मनुष्यों का प्रथम शत्रु है, जो शरीर में रहकर शरीर के ही विनाश के लिए होता है। जैसे लकड़ी में स्थित आग लकड़ी को ही जला देती है, वैसे ही (शरीरस्थ क्रोध) शरीर को जला (नष्ट कर) देता है।
मृगा मृगैः सङ्गमनुव्रजन्ति,
गावश्च गोभिः तुरगास्तुरङ्गैः।
मूर्खाश्च मूर्खैः सुधियः सुधीभिः,
समान-शील-व्यसनेषु सख्यम्॥6॥
हिन्दी अर्थ: हिरण हिरणों के साथ, गायें गायों के साथ, घोड़े घोड़ों के साथ, मूर्ख मूर्खों के साथ और बुद्धिमान बुद्धिमानों के साथ चलते हैं। समान स्वभाव और समान आदतों वालों में ही मित्रता होती है।
सेवितव्यो महावृक्षः फलच्छायासमन्वितः।
यदि दैवात् फलं नास्ति छाया केन निवार्यते॥7॥
हिन्दी अर्थ: फल और छाया दोनों से युक्त बड़े वृक्ष का ही आश्रय लेना चाहिए। यदि दुर्भाग्यवश फल न मिले, तो उसकी छाया को कौन रोक सकता है?
अमन्त्रमक्षरं नास्ति, नास्ति मूलमनौषधम्।
अयोग्यः पुरुषः नास्ति, योजकस्तत्र दुर्लभः॥8॥
हिन्दी अर्थ: ऐसा कोई अक्षर नहीं जो मंत्र न बन सके, ऐसी कोई जड़ नहीं जो औषधि न बन सके, ऐसा कोई पुरुष अयोग्य नहीं होता; बस उन्हें सही ढंग से जोड़ने (उपयोग करने) वाला दुर्लभ है।
संपत्तौ च विपत्तौ च महतामेकरूपता।
उदये सविता रक्तो रक्तश्चास्तमये तथा॥9॥
हिन्दी अर्थ: सम्पत्ति और विपत्ति दोनों में महापुरुषों का स्वभाव एक समान रहता है। जैसे सूर्य उदय के समय भी लाल होता है और अस्त होते समय भी लाल ही रहता है।
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विचित्रे खलु संसारे नास्ति किञ्चिन्निरर्थकम्।
अश्वश्चेद् धावने वीरः भारस्य वहने खरः॥10॥
हिन्दी अर्थ: इस विचित्र संसार में वास्तव में कुछ भी निरर्थक नहीं है। यदि घोड़ा दौड़ने में श्रेष्ठ है, तो गधा बोझ ढोने में श्रेष्ठ है।



