परिचय – सूक्तयः
सूक्तयः का अर्थ होता है – “सार्थक वाक्य” या “सत्य और नीति से युक्त कथन।” यह पाठ शेमुषी भाग 2 से लिया गया है और मूलतः तमिल ग्रंथ तिरुक्कुरल् से अनूदित है। इसके रचयिता तिरुवल्लुवर हैं, जिन्हें तमिल साहित्य का ऋषि माना जाता है। इस पाठ में जीवन के विभिन्न पहलुओं—जैसे शिक्षा, वाणी, विवेक, सदाचार, और आत्मकल्याण—से जुड़े नीतिवाक्य दिए गए हैं, जो छात्रों को नैतिकता और व्यवहारिक ज्ञान सिखाते हैं।
Convex Classes Jaipur में हम इस पाठ को सरल हिंदी अनुवाद के साथ प्रस्तुत करते हैं ताकि छात्र इसे आसानी से समझ सकें और परीक्षा में आत्मविश्वास से लिख सकें।
📜 श्लोक-वार हिंदी अनुवाद – सूक्तयः
नीचे हर संस्कृत श्लोक के साथ उसका हिंदी अनुवाद दिया गया है—step-by-step।
श्लोक 1
पिता यच्छति पुत्राय बाल्ये विद्याधनं महत्। पिताऽस्य किं तपस्तेपे इत्युक्तिस्तत्कृतज्ञता॥
🗣️ पिता अपने पुत्र को बचपन में ही विद्या रूपी महान धन देता है। “पिता ने इसके लिए कितना तप किया?” यह कहना ही उनके प्रति कृतज्ञता है।
श्लोक 2
अवक्रता यथा चित्ते तथा वाचि भवेद् यदि। तदेवाहुः महात्मानः समत्वमिति तथ्यतः॥
🗣️ जैसी सरलता मन में हो, वैसी ही यदि वाणी में भी हो, तो उसे ही महात्मा लोग “समत्व” कहते हैं।
श्लोक 3
त्यक्त्वा धर्मप्रदां वाचं परुषां योऽभ्युदीरयेत्। परित्यज्य फलं पक्वं भुङ्क्तेऽपक्वं विमूढधीः॥
🗣️ जो धर्मयुक्त वाणी को छोड़कर कठोर वाणी बोलता है, वह मूर्ख जैसे पके फल को छोड़कर कच्चा फल खाता है।
श्लोक 4
विद्वांस एव लोकेऽस्मिन् चक्षुष्मन्तः प्रकीर्तिताः। अन्येषां वदने ये तु ते चक्षुर्नामनी मते॥
🗣️ इस संसार में विद्वान ही नेत्रों वाले कहे गए हैं। दूसरों के चेहरे पर जो आँखें हैं, वे केवल नाम मात्र की हैं।
श्लोक 5
यत् प्रोक्तं येन केनापि तस्य तत्त्वार्थनिर्णयः। कर्तुं शक्यो भवेद्येन स विवेक इतीरितः॥
🗣️ जिसके द्वारा किसी कथन का वास्तविक अर्थ समझा जा सके, वही “विवेक” कहलाता है।
श्लोक 6
वाक्पटुधैर्यवान् मन्त्री सभायामप्यकातरः। स केनापि प्रकारेण परैर्न परिभूयते॥
🗣️ जो मंत्री वाणी में चतुर, धैर्यवान और सभा में भी निडर होता है, वह किसी भी प्रकार से शत्रुओं द्वारा अपमानित नहीं होता।
श्लोक 7
य इच्छत्यात्मनः श्रेयः प्रभूतानि सुखानि च। न कुर्यादहितं कर्म स परेभ्यः कदापि च॥
🗣️ जो व्यक्ति अपना कल्याण और अधिक सुख चाहता है, उसे दूसरों के लिए कभी अहितकारी कार्य नहीं करना चाहिए।
श्लोक 8
आचारः प्रथमो धर्मः इत्येतद् विदुषां वचः। तस्माद् रक्षेत् सदाचारं प्राणेभ्योऽपि विशेषतः॥
🗣️ सदाचार मनुष्य का पहला धर्म है—ऐसा विद्वानों का वचन है। इसलिए इसकी रक्षा प्राणों से भी अधिक करनी चाहिए।
निष्कर्ष
यह पाठ हमें सिखाता है कि जीवन में शिक्षा, सदाचार, विवेक और सत्यवाणी का अत्यंत महत्व है। ये सूक्तियाँ केवल परीक्षा के लिए नहीं, बल्कि व्यक्तित्व निर्माण के लिए भी उपयोगी हैं।
Convex Classes Jaipur में हम प्रत्येक संस्कृत पाठ को सरल, अर्थपूर्ण और परीक्षा-केंद्रित रूप में प्रस्तुत करते हैं—ताकि छात्र केवल अंक ही नहीं, समझ भी पाएं।
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