class 11 sanskrit chapter 1 (कुशलप्रशासनम्)
class 11 sanskrit chapter 1 (कुशलप्रशासनम्)
Home 9 question or answer 9 class 11 sanskrit chapter 1 (कुशलप्रशासनम्)

class 11 sanskrit chapter 1 (कुशलप्रशासनम्)

by | Jan 6, 2026 | 0 comments

कक्षा 11 संस्कृत अध्याय 1 – कुशलप्रशासनम् (हिंदी अनुवाद व प्रश्नोत्तर)

परिचय

कक्षा 11 संस्कृत का पहला अध्याय कुशलप्रशासनम् है। इसका अर्थ है सक्षम या उत्तम शासन। इस पाठ में बताया गया है कि एक आदर्श राजा और उसके मंत्री कैसे राज्य का संचालन करें। धर्म, न्याय और अनुशासन को शासन की नींव माना गया है।

iit 2026
iit 2026

प्रमुख श्लोक व हिंदी अनुवाद

श्लोक 1 (ऋग्वेद 10.191.2)

संस्कृत: संगच्छध्वं सं वदध्वं सं वो मनांसि जानताम्। देवो भगः यथा पूर्वे संजानानाम् उपासते॥

हिंदी अनुवाद: आप सब मिलकर चलें, मिलकर बोलें और आपके मन भी एक हों। जैसे पहले लोग भगवान भग का सामूहिक रूप से पूजन करते थे, वैसे ही आप भी एकता में रहें।

श्लोक 2 (ऋग्वेद 10.191.4)

संस्कृत: समानी वा आकूतिः समाना हृदयानि वः। समानमस्तु वो मनो यथा वः सुसहासति॥

हिंदी अनुवाद: आप सबकी आकांक्षाएँ समान हों, आपके हृदय समान हों। आपका मन भी समान हो, जिससे आप सब सुखपूर्वक साथ रह सकें।

श्लोक 3 (ऋग्वेद 1.90.7)

संस्कृत: मित्रं व्रतम् सत्यं व्रतम् ऋतं व्रतम्।

हिंदी अनुवाद: सत्य का पालन करो, धर्म का पालन करो। यही मनुष्य का सर्वोच्च व्रत है।

श्लोक 4

संस्कृत: यत्तक्ष्यते नुज्रस्निर्देवाः रणं सुप्रस्रवतोऽस्मै। नुज्रस्निर्देवाः प्रार्थयन्ते रुचं मनः श्रद्धया युक्तम्॥

हिंदी अनुवाद: जो देवता दूर प्रतीत होते हैं, वे वास्तव में निकट ही हैं। श्रद्धा और विश्वास से उन्हें अनुभव किया जा सकता है। मन को शुद्ध करके ही ईश्वर की प्राप्ति होती है।

सारांश

  • राजा को धर्मप्रिय, न्यायप्रिय और अनुशासित होना चाहिए।
  • मंत्री को विद्वान, निष्ठावान और कुशल होना चाहिए।
  • धर्म और न्याय ही राज्य की विजय और समृद्धि का आधार हैं।
  • ईर्ष्या, अहंकार और अन्याय मनुष्य के सबसे बड़े शत्रु हैं।
  • श्रद्धा और विश्वास से ही ईश्वर की अनुभूति होती है।

श्लोक 5

रूपप्रकर्षोऽपि ग्रा पुरलक्षणप्रपञ्चः। ईर्ष्यसे शत्रुः शत्राणां तस्मात् शत्रुः शत्रुः। धर्मेण शत्रुः शत्रुः प्रज्वले शत्रुः शत्रुः। अन्यथा शत्रुः शत्रुः भूमौऽपि शत्रुः शत्रुः॥”

हिंदी अनुवाद (भावार्थ)

  • रूप और वैभव का विस्तार भी यदि अहंकार और ईर्ष्या से जुड़ा हो तो वह शत्रु बन जाता है।
  • ईर्ष्या स्वयं शत्रु है, क्योंकि वह दूसरों को भी शत्रु बना देती है।
  • धर्म के मार्ग से हटकर किया गया कार्य भी शत्रु है, क्योंकि वह समाज को जलाता है।
  • अन्यथा, चाहे भूमि पर ही क्यों न हो, अन्याय और ईर्ष्या शत्रु ही रहती है।
neet crash course 2026
neet crash course 2026

सारांश

इस श्लोक का मुख्य संदेश है कि:

  • ईर्ष्या, अहंकार और अन्याय मनुष्य के सबसे बड़े शत्रु हैं।
  • धर्म और न्याय का पालन ही जीवन को सुरक्षित और सुखी बनाता है।
  • बाहरी शत्रु से बड़ा शत्रु हमारे भीतर का दोष है।

श्लोक 6

“त्वं विचित्रि बहुधा विकल्पेन नानामार्गेण प्रथितो यथासदनम्। सर्वत्र धारा नदीनां च नद्याः श्रोतसोऽश्नुयुः परिपूर्णतां॥”

हिंदी अनुवाद (सरल भावार्थ)

हे ईश्वर! आप अनेक प्रकार से प्रकट होते हैं। आप विभिन्न मार्गों से प्रसिद्ध हैं और सबके आश्रय हैं। जैसे नदियाँ अपने जल से समुद्र को भर देती हैं, वैसे ही सब मार्ग अंततः आप तक ही पहुँचते हैं।

सारांश

  • यह श्लोक बताता है कि ईश्वर अनेक रूपों में प्रकट होते हैं
  • सभी मार्ग और साधन अंततः उसी परम सत्य तक पहुँचते हैं
  • जैसे नदियाँ समुद्र में मिल जाती हैं, वैसे ही सभी साधन और धर्म ईश्वर में मिलते हैं।

परीक्षा‑उपयोगी प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1: अध्याय 1 का नाम क्या है?

👉 कुशलप्रशासनम्।

प्रश्न 2: इस अध्याय का मुख्य संदेश क्या है?

👉 धर्म और न्याय पर आधारित शासन ही आदर्श शासन है।

प्रश्न 3: राजा और मंत्री के क्या गुण बताए गए हैं?

👉 राजा धर्मप्रिय और न्यायप्रिय होना चाहिए, मंत्री विद्वान और निष्ठावान होना चाहिए।

प्रश्न 4: “राज्ञां विजयमूलं धर्मः” का अर्थ क्या है?

👉 राजा की विजय का मूल धर्म है।

प्रश्न 5: इस अध्याय से छात्रों को क्या शिक्षा मिलती है?

👉 नेतृत्व में ईमानदारी, अनुशासन और न्याय आवश्यक हैं।

निष्कर्ष

कक्षा 11 संस्कृत का पहला अध्याय कुशलप्रशासनम् छात्रों को केवल भाषा ही नहीं सिखाता, बल्कि शासन और नेतृत्व के नैतिक मूल्यों को भी समझाता है। यह पाठ हमें बताता है कि धर्म और न्याय ही किसी भी समाज की असली शक्ति हैं।

class 11 sanskrit chapter 1 (कुशलप्रशासनम्) question answer

Search

Recent Blogs