६. लट्-लकार त्रिषु पुरुषेषु (उदाहरण-रूप — शेष शब्द इसी प्रतिमान से बनेंगे)
सभी दिए गए शब्द (लभते, जायते, भाषते आदि) आत्मनेपदी हैं और एक ही प्रत्यय-प्रतिमान का अनुसरण करते हैं: -ते/-एते/-न्ते, -से/-एथे/-ध्वे, -ए/-आवहे/-आमहे
उदाहरणस्वरूप लभते (लभ् धातु):
पुरुष
एकवचनम्
द्विवचनम्
बहुवचनम्
प्रथम
लभते
लभेते
लभन्ते
मध्यम
लभसे
लभेथे
लभध्वे
उत्तम
लभे
लभावहे
लभामहे
इसी प्रतिमान से शेष धातुओं के रूप बनाइए — जैसे जायते → जायेते/जायन्ते; भाषते → भाषेते/भाषन्ते; विद्यते → विद्येते/विद्यन्ते; मोदते → मोदेते/मोदन्ते; इत्यादि।
७. आत्मनेपदि धातूनां लोट्-लकारे (उदाहरण के अनुसार)
मोदताम् (मुद् धातु):
एकवचनम्
द्विवचनम्
बहुवचनम्
मोदताम्
मोदेताम्
मोदन्ताम्
मोदस्व
मोदेथाम्
मोदध्वम्
मोदै
मोदावहै
मोदामहै
वर्धताम् (वृध् धातु):
एकवचनम्
द्विवचनम्
बहुवचनम्
वर्धताम्
वर्धेताम्
वर्धन्ताम्
वर्धस्व
वर्धेथाम्
वर्धध्वम्
वर्धै
वर्धावहै
वर्धामहै
८. कर्तृपदानुसारं लोट्-लकारेण क्रियापद-परिवर्तन
लट्-लकार:
लोट्-लकार:
बालकः अन्नस्य निन्दां न कुरुते।
भवान् अन्नस्य निन्दां न कुरुताम्।
मम जीवने यशो वर्धते।
तव जीवने यशः वर्धताम्।
अहं बौद्धिकविकासाय सदा योगासनं कुर्वे।
त्वं बौद्धिकविकासाय सदा योगासनं कुरुष्व।
रमेशः सर्वदा सत्यं भाषते।
दिनेशः सर्वदा सत्यं भाषताम्।
छात्रः लक्ष्यसिद्धये कष्टं सहते।
अहं लक्ष्यसिद्धये कष्टं सहै।
साधवः सर्वदा रमन्ते।
भवन्तः सर्वदा रमन्ताम्।
भवान् योगेन आरोग्यं लभते।
अहं योगेन आरोग्यं लभै।
रमा सदा सत्कर्मणि यतते।
लता सदा सत्कर्मणि यतताम्।
भक्तः ईश्वरं वन्दते।
त्वं ईश्वरं वन्दस्व।
भाग ३ — शब्दार्थ-सार (कुछ प्रमुख शब्द, हिन्दी में)
संस्कृत शब्द
हिन्दी अर्थ
अन्वेष्टव्यम्
खोज करनी चाहिए
अवबुद्धम्
समझा गया
उदीरितम्
कहा गया
कामः
इच्छा
कुर्वीत
करना चाहिए
धृतिः
धैर्य
धीः
बुद्धि
निष्क्रान्तिः
बाहर जाना
परिहर्तव्यम्
त्याग करना चाहिए
प्रकटितम्
प्रकट हुआ
प्राणः
प्राणवायु
ब्रह्म
परमात्मा/ईश्वर
भूतानि
प्राणी जन
विचिकित्सा
सन्देह
विज्ञानम्
बुद्धि
विप्रमोक्षः
अत्यन्त मोक्ष
विवर्धन्ते
विशेष रूप से बढ़ते हैं
श्रद्धा
निष्ठा
सङ्कल्पः
संकल्प
सम्भवन्ति
उत्पन्न होते हैं
साधनीयम्
संस्कार करना चाहिए
स्मृतिलम्भे
ध्रुव स्मृति (आत्मज्ञान) की प्राप्ति होने पर
हातव्याः
त्याग करना चाहिए
ह्रीः
लज्जा
भाग ४ — कर्तृ-कर्मवाच्य नियम (संक्षेप में)
कर्तृवाच्य: कर्ता में प्रथमा विभक्ति, कर्म में द्वितीया विभक्ति; क्रिया कर्तानुसार होती है।
उदा.: राम: पाठं पठति।
कर्मवाच्य: कर्म में प्रथमा, कर्ता में तृतीया विभक्ति; क्रिया कर्मानुसार तथा आत्मनेपदी होती है।
उदा.: रामेण पाठः पठ्यते।
तव्यत्/अनीयर् प्रत्यय भी विधि/लोट्/लृट् के योग्यार्थ में प्रयुक्त होते हैं (उदा. परिहर्तव्यम्/परिहरणीयम्), जहाँ कृदन्त पद कर्मपद के लिंग-वचन के अनुसार बदलता है।
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