तृतीयः पाठः — आत्मवत्सर्वभूतेषु यः पश्यति सः पण्डितः
(कक्षा ९ शारदा — पूर्ण हिंदी अनुवाद एवं प्रश्नोत्तर)
भाग १: गद्यांश का हिंदी अनुवाद
मूल (परिचयात्मक अनुच्छेद): भारतदेश अनेक ब्रह्मर्षियों और महात्माओं की भूमि है। उनके चरित्र सम्पूर्ण विश्व के लिए प्रेरणा के स्रोत हैं। उनके चरित्रों में हर कदम पर प्राणी-दया, समता, क्षमा, अहिंसा, करुणा, सरलता, बन्धुता आदि जीवन-मूल्य प्राप्त होते हैं। महाराष्ट्र के प्रसिद्ध महात्मा नामदेव महाराज ने अपने व्यवहार से करुणा का महान आदर्श प्रस्तुत किया। उन्होंने सर्वव्यापी ईश्वर का न केवल कीर्तन किया, बल्कि सभी प्राणियों में भगवान को देखा। नामदेव महाराज के जीवन की एक शिक्षाप्रद घटना यहाँ प्रस्तुत की गई है, जिसे पढ़कर हमारा जीवन बदल जाए।
कथा-आरम्भ: कपिल और माधवी छुट्टी के समय मामा के घर गए। वहाँ खेलते समय उन्होंने एक कुत्ता देखा। उसे देखकर पत्थर का टुकड़ा हाथ में लेकर उसे मारने के लिए दौड़े। कुत्ता डर के मारे चिल्लाता हुआ तेज़ी से भागा। यह देखकर कपिल और माधवी ज़ोर से हँस पड़े। नानी ने यह दृश्य दूर से देखा और दोनों को बुला लिया।
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नानी: अरे कपिल! माधवी! क्या कर रहे हो?
कपिल: नानी! देखिए तो। यह कुत्ता हमारे खेल में बार-बार घुसकर हमें परेशान कर रहा था, इसलिए हमने इसे अच्छी तरह दण्ड दिया। (फिर ज़ोर से हँसे)
नानी: बच्चो, अब खेल बहुत हुआ। कहानी सुनना चाहते हो क्या?
दोनों: नानी की कहानी! मुझे कहानी अच्छी लगती है… मुझे अच्छी लगती है नानी। (नानी को गले लगाया)
नानी: बैठ जाओ, ध्यान से सुनो। हमारी भारतभूमि अनेक नररत्नों, ब्रह्मर्षियों और राजर्षियों को जन्म देने वाली है। बहुत-से सत्पुरुषों ने अपने कर्मों से जन्म सार्थक किया है। क्या तुम दोनों महात्मा नामदेव को जानते हो?
माधवी: हाँ। मैंने सुना है कि उनके कीर्तन में स्वयं भगवान पाण्डुरंग ने नृत्य किया था। क्या यह सच है?
नानी: हाँ। यह उन्हीं पुण्यश्लोक, पाण्डुरंग के मित्र नामदेव महाराज की कथा है। नामदेव न केवल पाण्डुरंग के प्रिय भक्त थे, बल्कि प्रिय मित्र भी थे। भगवान नामदेव के साथ ही रहते थे।
माधवी: क्या सचमुच पाण्डुरंग नामदेव के मित्र थे?
कपिल: क्या भगवान के साथ भी मित्रता सम्भव है?
नानी: हाँ बच्चो। भगवान पाण्डुरंग नामदेव के प्रिय मित्र थे। नामदेव प्रतिदिन पाण्डुरंग को भोग अर्पित करके, उन्हें भोजन कराकर उसके बाद ही स्वयं अन्न खाते थे। उनके गुरु विसोबा थे। विसोबा ने उन्हें सिखाया था कि — “ईश्वर केवल मन्दिर में नहीं होता, बल्कि सभी प्राणियों में उसका निवास होता है। इसलिए उस सर्वव्यापी ईश्वर की पूजा करो।”
कपिल: नानी! क्या सचमुच ईश्वर सभी प्राणियों में रहता है?
नानी: हाँ, सुनो बेटा! नामदेव प्रतिदिन बड़ी श्रद्धा, निष्ठा और भक्ति से भोग की थाली लेकर मन्दिर जाते थे। एक बार उन्होंने भोग की थाली लेकर मूर्ति के सामने रखी। आँखें बन्द करके प्रार्थना की —
हे देव! भोग स्वीकार करो, मेरी भक्ति को अटल बनाओ। मेरी इच्छित वस्तु दो और परलोक में उत्तम गति दो। मिठाई के टुकड़े, दही-दूध-घी सहित पदार्थ, खाने योग्य आहार — यह भोग स्वीकार करो।
मन्त्र बोलकर श्रद्धापूर्वक प्रणाम करके उन्होंने आँखें खोलीं। ओह आश्चर्य! सामने रखी थाली में रोटी नहीं थी।
माधवी: क्या पाण्डुरंग आकर खा गए?
नानी: नहीं। कोई भूखा कुत्ता आकर रोटी मुँह में लेकर भाग गया।
कपिल: धिक्कार है कुत्ते को! नानी! देखिए, कुत्ते दुष्ट ही होते हैं।
माधवी: सच भाई! नामदेव को कितना दुःख हुआ होगा।
नानी: बच्चो, सुनो। नामदेव कुत्ते के पीछे दौड़े। जानते हो क्यों और कैसे?
कपिल: क्रोध में आकर लाठी लेकर कुत्ते को मारने दौड़े होंगे!
माधवी: दण्ड देने के लिए पत्थर का टुकड़ा लेकर दौड़े होंगे! सच बताइए नानी!
नानी: नहीं बच्चो! नामदेव क्रोध से नहीं दौड़े, बल्कि करुणा से दौड़े। न लाठी, न पत्थर — बल्कि घी का बर्तन लेकर।
दोनों: (आश्चर्य से ज़ोर से) क्या घी का बर्तन लेकर?
नानी: हाँ, घी का बर्तन लेकर ही।
दोनों: लेकिन क्यों?
नानी: हुआ यूँ कि कुत्ता सूखी रोटी चुराकर भाग गया था। महात्मा नामदेव को यह चिन्ता हुई कि यदि कुत्ता सूखी रोटी खाएगा तो उसके पेट में दर्द होगा। इसलिए उसे कष्ट न हो — यह सोचकर घी का बर्तन लेकर “हे देव! सूखी रोटी मत खाओ, घी भी लो” कहते हुए वे उसके पीछे दौड़े। (दोनों एक-दूसरे को देखते हैं। अपराध-बोध से उनके चेहरे उदास हो गए।)
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📞 सम्पर्क करें: 8290601516नानी: दौड़ता हुआ कुत्ता अदृश्य हो गया। उसकी जगह पाण्डुरंग प्रकट हो गए। उन्होंने नामदेव से कहा — “बेटा नामदेव! तुम परीक्षा में उत्तीर्ण हुए। ‘ईश्वर सभी प्राणियों में निवास करता है’ — इस गुरु-उपदेश को तुमने न केवल सुना, बल्कि पालन भी किया। सचमुच तुम धन्य हो।”
कपिल: नानी! मुझसे भूल हुई। मैंने बिना कारण ही कुत्ते को मारा। इससे पहले भी कई बार मैंने जीवों को कष्ट पहुँचाया है। आज मुझे समझ आया कि सभी जीवों में ईश्वर निवास करता है, इसलिए अब मैं किसी को भी कष्ट नहीं दूँगा।
माधवी: नानी! मुझे क्षमा करें। मैं भी कभी किसी को कष्ट नहीं दूँगी।
नानी: दीर्घायु हो बच्चो! मेरे पास आओ। (गले लगाकर) हमारे शरीर, वाणी या मन से किसी को कष्ट न पहुँचे। तथा जिसे भी कोई कष्ट हो, उसे दूर करने का प्रयत्न करेंगे — ऐसा संकल्प लें। हमारा यही ध्येय हो —
“जो सब प्राणियों को अपने समान देखता है, वही पण्डित है।”



