सप्तमः पाठः — उपायं चिन्तयेत् प्राज्ञस्तथापायं च चिन्तयेत्
(कक्षा ९, शारदा — पूर्ण हिन्दी अनुवाद तथा अभ्यास प्रश्नोत्तर)
भाग १ : आरम्भिक संवाद का हिन्दी अनुवाद
पुत्र: मातः! पश्यतु, अद्य अहं मार्गे पतितं धनं प्राप्तवान्। एतेन धनेन बहूनि क्रीडनकानि क्रीणामि।
हिन्दी: माँ! देखिए, आज मैंने रास्ते में गिरा हुआ पैसा पाया। इस पैसे से मैं बहुत सारे खिलौने खरीदूँगा।
माता: न हि पुत्र! एतत् अन्यस्य श्रमार्जितं धनमस्ति, तस्मै एव प्रत्यर्पणीयम्। अन्यस्य धनं तृणम् इव गणनीयम्।
हिन्दी: नहीं बेटा! यह किसी और की मेहनत से कमाया हुआ पैसा है, इसे उसी को लौटा देना चाहिए। दूसरे के धन को तिनके के समान समझना चाहिए।
पुत्र: मातः! अन्यस्य धनं तृणम् इव कथं भवति?
हिन्दी: माँ! दूसरे का धन तिनके के समान कैसे होता है?
माता: एहि पुत्र! अहं तुभ्यं पञ्चतन्त्रस्य काञ्चन कथां श्रावयामि यया त्वं स्वप्रश्नस्य उत्तरं प्राप्तुं शक्नोषि।
हिन्दी: आओ बेटा! मैं तुम्हें पंचतंत्र की एक कथा सुनाती हूँ, जिससे तुम अपने प्रश्न का उत्तर पा सकोगे।
पुत्र: मातः! तर्हि कृपया सत्वरं श्रावयतु। हिन्दी: माँ! तो कृपया जल्दी सुनाइए।
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📞 सम्पर्क करें: 8290601516भाग २ : कथा का सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद (धर्मबुद्धि-पापबुद्धि कथा — पञ्चतन्त्र, मित्रभेदः)
संस्कृत: कस्मिंश्चिद्देशे धर्मबुद्धिः पापबुद्धिश्च द्वे मित्रे प्रतिवसतः स्म।
हिन्दी: किसी देश में धर्मबुद्धि और पापबुद्धि नामक दो मित्र रहते थे।
संस्कृत: अथ कदाचित् पापबुद्धिना चिन्तितं यदहं तावान्मूर्खो दरिद्रतया पीडितश्च।
हिन्दी: एक बार पापबुद्धि ने सोचा कि मैं इतना मूर्ख हूँ और दरिद्रता से पीड़ित हूँ।
संस्कृत: अत एनं धर्मबुद्धिं स्वीकृत्य अन्यं देशं गच्छामि, तत्र अस्य आश्रयणेन धनं सम्पादयामि, अनन्तरम् एनमपि वञ्चयित्वा सुखी भवामि इति।
हिन्दी: इसलिए मैं इस धर्मबुद्धि को साथ लेकर दूसरे देश जाता हूँ, वहाँ इसके सहारे धन कमाता हूँ, और उसके बाद इसे भी ठगकर सुखी हो जाता हूँ — ऐसा (उसने सोचा)।
संस्कृत: अथान्यस्मिन् अहनि धर्मबुद्धिमुपेत्याह —
हिन्दी: फिर दूसरे दिन वह धर्मबुद्धि के पास जाकर बोला —
पापबुद्धि: भो मित्र! यदा भवान् वृद्धः भवति तदा ‘बाल्ये यौवने वा मया एवं कृतम्’ इति वक्तुं योग्यं किं कार्यं स्मरति? भवता अन्यः देशः न दृष्टः एव चेत् भवतः शिशून् अन्यदेशसम्बन्धे कां कथां वदिष्यति?
हिन्दी: हे मित्र! जब आप बूढ़े हो जाएँगे, तब ‘बचपन में या जवानी में मैंने ऐसा किया था’ — ऐसा कहने योग्य कौन-सा काम आपको याद रहेगा? यदि आपने कोई दूसरा देश देखा ही नहीं, तो आप अपने बच्चों को दूसरे देशों के बारे में कौन-सी बात बताएँगे?
संस्कृत: उक्तमेव — देशान्तरेषु बहुविधभाषावेषादि येन न ज्ञातम्। भ्रमता धरणीपीठे तस्य फलं जन्मनो व्यर्थम्॥
हिन्दी: यही कहा गया है — जिस व्यक्ति ने दूसरे देशों में जाकर विभिन्न प्रकार की भाषा, वेशभूषा आदि नहीं जानी, पृथ्वी पर घूमते हुए भी उसके जन्म का फल व्यर्थ है।
संस्कृत: एवमेव विद्यां वित्तं शिल्पं तावन्नाप्नोति मानवः सम्यक्। यावद् व्रजति न भूमौ देशाद्देशान्तरं हृष्टः॥
हिन्दी: इसी प्रकार मनुष्य विद्या, धन और शिल्प (कला-कौशल) को तब तक भली-भाँति प्राप्त नहीं करता, जब तक वह प्रसन्नतापूर्वक पृथ्वी पर एक देश से दूसरे देश में नहीं जाता।
पापबुद्धि: अतः आवां देशान्तरं गत्वा धनम् अर्जयित्वा आगच्छाव इति।
हिन्दी: इसलिए हम दोनों दूसरे देश जाकर धन कमाकर लौटें।
संस्कृत: अथ तस्य तद्वचनमाकर्ण्य प्रहृष्टमनाः धर्मबुद्धिः आह – अस्तु तावत् गुरुजनाज्ञया गच्छावः।
हिन्दी: फिर उसकी यह बात सुनकर प्रसन्न मन वाले धर्मबुद्धि ने कहा — ठीक है, गुरुजनों की आज्ञा लेकर चलते हैं।
संस्कृत: (ततस्तौ गुरुजनानामनुमतिं प्राप्य शुभेऽहनि देशान्तरं प्रस्थितौ। पापबुद्धिः धर्मबुद्धेः प्रभावेण प्रभूतं धनं सम्पादितवान्)
हिन्दी: (फिर वे दोनों गुरुजनों की अनुमति लेकर शुभ दिन दूसरे देश के लिए चल पड़े। पापबुद्धि ने धर्मबुद्धि के प्रभाव से बहुत सारा धन कमाया।)
पापबुद्धि: मित्र! आवाभ्यामिदानीं प्रचुरं धनमुपार्जितम्। अत्रागत्य वर्षाणि व्यतीतानि, सर्वं धनं स्वीकृत्य स्वग्रामं गच्छावः।
हिन्दी: मित्र! अब हम दोनों ने बहुत धन कमा लिया है। यहाँ आए हुए बहुत वर्ष बीत गए हैं, अब सारा धन लेकर अपने गाँव चलते हैं।
धर्मबुद्धि: अथ किम्। तथैवास्तु।
हिन्दी: क्यों नहीं। ऐसा ही हो।
संस्कृत: (यदा तौ स्वनगरसमीपमागतवन्तौ तदा)
हिन्दी: (जब वे दोनों अपने नगर के पास आ गए, तब)
पापबुद्धि: भद्र! एतत् सर्वं धनं गृहं प्रति नेतुं न उचितम्। अतः एतद्धनमत्रैव गहनारण्ये कुत्रापि भूमौ निक्षिप्य किञ्चिन्मात्रमादाय गृहं प्रविशावः।
हिन्दी: भद्र! यह सारा धन घर ले जाना उचित नहीं है। इसलिए इस धन को यहीं इस घने जंगल में कहीं ज़मीन में रखकर, थोड़ा-सा लेकर घर में प्रवेश करते हैं।
धर्मबुद्धि: सत्यमेवाभिहितं भवता, तथैव कुर्वः।
हिन्दी: आपने सच ही कहा है, वैसा ही करते हैं।
संस्कृत: यथा द्वाभ्यां चिन्तितं तथैव भूमिं खनित्वा तत्रैव धनं निक्षिप्य स्वगृहं गतवन्तौ। अन्यस्मिन्नहनि पापबुद्धिः निशीथे अटव्यां गत्वा तत्सर्वं वित्तं समादाय गर्तं पूरयित्वा स्वभवनं गतवान्।
हिन्दी: जैसा दोनों ने सोचा था, वैसे ही ज़मीन खोदकर वहीं धन रखकर अपने-अपने घर गए। दूसरे दिन आधी रात में पापबुद्धि जंगल में जाकर वह सारा धन निकाल लाया, गड्ढे को (मिट्टी से) भर दिया और अपने घर चला गया।
संस्कृत: (अथ कतिचिद्दिनानन्तरम्)
हिन्दी: (फिर कुछ दिनों बाद)
पापबुद्धि: सखे! मम कुटुम्बे बहवः जनाः सन्ति, धनाभावात् कष्टम् अनुभवामि। अतः तत्र गत्वा किञ्चिन्मात्रं धनमानयावः।
हिन्दी: मित्र! मेरे परिवार में बहुत सारे लोग हैं, धन के अभाव से मुझे कष्ट हो रहा है। इसलिए वहाँ जाकर थोड़ा-सा धन ले आते हैं।
धर्मबुद्धि: अस्तु मित्र! गच्छावः।
हिन्दी: ठीक है मित्र! चलते हैं।
संस्कृत: (अथ द्वावपि गत्वा तत्स्थानं यावत् खनतः तावद्रिक्तं भाण्डं दृष्टवन्तौ। अत्रान्तरे पापबुद्धिः शिरस्ताडयन् उक्तवान्)
हिन्दी: (फिर दोनों वहाँ जाकर जैसे ही उस स्थान को खोदते हैं, वैसे ही खाली बर्तन देखते हैं। इसी बीच पापबुद्धि सिर पीटते हुए बोला)
पापबुद्धि: भोः धर्मबुद्धे! त्वयैवापहृतम् एतद्धनं, नान्येन। तत्प्रयच्छ मे तदर्धम्। अन्यथा अहं राजकुले निवेदयिष्यामि।
हिन्दी: हे धर्मबुद्धि! यह धन तुमने ही चुराया है, किसी और ने नहीं। इसलिए उसका आधा हिस्सा मुझे दो। नहीं तो मैं राजदरबार में शिकायत करूँगा।
धर्मबुद्धि: भोः दुरात्मन्! मा मैवं वद। धर्मबुद्धिः खल्वहम्। नैतत् चौरकर्म करोमि।
हिन्दी: हे दुष्ट! मुझसे ऐसा मत कहो। मैं तो सचमुच धर्मबुद्धि (धर्मपूर्ण बुद्धि वाला) हूँ। मैं यह चोरी का काम नहीं करता।
संस्कृत: मातृवत्परदारेषु परद्रव्येषु लोष्ठवत्। आत्मवत्सर्वभूतेषु वीक्षन्ते धर्मबुद्धयः॥
हिन्दी: धर्मबुद्धि वाले लोग दूसरों की स्त्रियों को माता के समान, दूसरों के धन को मिट्टी के ढेले के समान, और सभी प्राणियों को अपने ही समान देखते हैं।
संस्कृत: (एवं द्वावपि विवदमानौ धर्माधिकारिणं निकषा गतौ)
हिन्दी: (इस प्रकार आपस में विवाद करते हुए दोनों धर्माधिकारी (न्यायाधीश) के पास गए)
धर्माधिकारी: ननु न कोऽपि साक्षी युवाभ्यामन्यतरस्य चौरकर्मणः। अतः यत्र मानुषप्रमाणम् अनुपलब्धं तत्र वनदेवता एव न्यायनिर्णयं करिष्यति। अतः प्रातःकाले युवामस्माभिः सह तत्र वनप्रदेशं गच्छतम्। तत्रैव निर्णयः भविष्यति।
हिन्दी: निश्चय ही तुम दोनों में से किसी की भी चोरी का कोई गवाह नहीं है। इसलिए जहाँ मानवीय प्रमाण उपलब्ध नहीं है, वहाँ वनदेवता ही न्याय का निर्णय करेंगी। इसलिए सुबह तुम दोनों हमारे साथ उस वन प्रदेश में चलो। वहीं निर्णय होगा।
संस्कृत: (अत्रान्तरे पापबुद्धिः गृहं गत्वा स्वजनकं प्रबोधितवान्)
हिन्दी: (इसी बीच पापबुद्धि घर जाकर अपने पिता को समझाने लगा)
पापबुद्धि: तात! मया धर्मबुद्धेः प्रभूतः अर्थः चोरितः। भवान् यदि मदुक्तप्रकारेण वदति तर्हि तद्धनं मयि स्थिरं तिष्ठति, अन्यथास्माकं प्राणैः सह यास्यति।
हिन्दी: पिताजी! मैंने धर्मबुद्धि का बहुत सारा धन चुराया है। यदि आप मेरे बताए तरीके से बोलेंगे, तो वह धन मेरे पास ही रहेगा, नहीं तो हमारे प्राणों के साथ चला जाएगा।
पिता: वत्स! द्रुतं वद, अहं किं करवाणि येन तद्द्रव्यं स्थिरं तिष्ठेत्।
हिन्दी: बेटा! जल्दी बताओ, मैं क्या करूँ जिससे वह धन स्थिर रहे (सुरक्षित रहे)।
पापबुद्धि: तात! अस्ति वनप्रदेशे महाशमी नाम वृक्षः। तस्मिन् महाकोटरम् अस्ति। तत्र भवान्साम्प्रतमेव प्रविशतु। ततः प्रभाते यदाहं सत्यश्रावणाय निवेदयामि, तदा भवता वक्तव्यं यद् धर्मबुद्धिः चौर इति।
हिन्दी: पिताजी! वन प्रदेश में महाशमी नाम का एक पेड़ है। उसमें एक बड़ा-सा खोखल (कोटर) है। आप अभी उसमें प्रवेश कर जाइए। फिर सुबह जब मैं सत्य सुनाने का निवेदन करूँ, तब आप कहिएगा कि धर्मबुद्धि चोर है।
संस्कृत: (तथा कृते, प्रातःकाले स्नात्वा पापबुद्धिः धर्मबुद्धिना धर्माधिकारिणा च सह न्यायार्थं वनदेवतायाः समीपमुपागतः। अन्येऽपि सामाजिकाः तद्द्रष्टुमागताः)
हिन्दी: (ऐसा किए जाने पर, सुबह स्नान करके पापबुद्धि धर्मबुद्धि और धर्माधिकारी के साथ न्याय के लिए वनदेवता के पास पहुँचा। अन्य लोग भी यह देखने के लिए आए)
पापबुद्धि: आदित्यचन्द्रावनिलोऽनलश्च द्यौर्भूमिरापो हृदयं यमश्च। अहश्च रात्रिश्च उभे च संध्ये धर्मो हि जानाति नरस्य वृत्तम्॥
हिन्दी: सूर्य, चंद्रमा, वायु, अग्नि, आकाश, पृथ्वी, जल, हृदय, यम, दिन, रात्रि तथा दोनों संध्याएँ (सुबह-शाम) — धर्म ही मनुष्य के आचरण को जानता है।
पापबुद्धि: भगवति वनदेवते! आवयोर्मध्ये यः चौरः त्वं कथय।
हिन्दी: हे भगवती वनदेवता! हम दोनों में से जो चोर है, वह आप बता दीजिए।
पिता (शमीकोटरस्थः): भोः! शृणुत, शृणुत! धर्मबुद्धिना हृतम् एतद्धनम्।
हिन्दी: शमी वृक्ष के खोखल में छिपे हुए पिता ने कहा: अरे! सुनो, सुनो! यह धन धर्मबुद्धि ने चुराया है।
संस्कृत: (तद् आकर्ण्य ते सर्वे जनाः विस्मयेन उत्फुल्ललोचनाः सञ्जाताः)
हिन्दी: (यह सुनकर वे सभी लोग आश्चर्य से फटी हुई आँखों वाले हो गए)
सर्वे जनाः: धनापहरणदोषहेतोः शास्त्रविहितप्रकारेण धर्मबुद्धये दण्डः दातव्यः।
हिन्दी: धन चुराने के दोष के कारण, शास्त्र-विहित (शास्त्रोक्त) तरीके से धर्मबुद्धि को दंड दिया जाना चाहिए।
धर्मबुद्धि: इदं मिथ्याभाषितमस्ति। नाहं चोरितवान्। अहम् एतत् शमीकोटरं वह्निभोज्यद्रव्यैः परिवेष्ट्य वह्निना प्रज्वालयामि। (तथा करोति)
हिन्दी: यह झूठ बोला गया है। मैंने चोरी नहीं की। मैं इस शमी वृक्ष के खोखल को जलने योग्य वस्तुओं से घेरकर आग से जला देता हूँ। (वैसा करता है)
संस्कृत: (अथ ज्वलति तस्मिन् शमीकोटरे अर्धदग्धशरीरः स्फुटितेक्षणः करुणं विलपन् पापबुद्धिपिता बहिरागतः)
हिन्दी: (फिर जब वह शमी का खोखल जलने लगा, तब आधे जले हुए शरीर वाला, फूली हुई आँखों वाला, करुणतापूर्वक विलाप करता हुआ पापबुद्धि का पिता बाहर निकल आया)
संस्कृत: ततश्च जनाः (साश्चर्यम्) भोः! किमिदम्? किमिदम्?
हिन्दी: फिर सब लोग (आश्चर्य से) बोले: अरे! यह क्या है? यह क्या है?
पापबुद्धि का पिता: एतत्सर्वमपि पापबुद्धेः चेष्टितम्। (इत्युक्त्वा मृतः)
हिन्दी: यह सब पापबुद्धि की ही करतूत है। (ऐसा कहकर वह मर गया)
धर्माधिकारी: एष पापबुद्धिः दण्डनीयः।
हिन्दी: यह पापबुद्धि दंड देने योग्य है।
संस्कृत: (राजपुरुषाः नियमानुसारं पापबुद्धिं दण्डितवन्तः धर्मबुद्धिं प्रशंसितवन्तः च)
हिन्दी: (राजपुरुषों ने नियम के अनुसार पापबुद्धि को दंड दिया और धर्मबुद्धि की प्रशंसा की)
सर्वे जनाः: भो धर्मबुद्धे! त्वया सम्यक् कृतम्। पापबुद्धेः व्यर्थपाण्डित्यात् पिता वह्निना घातितः। अतः साधूक्तम् — उपायं चिन्तयेत् प्राज्ञस्तथापायं च चिन्तयेत्।
हिन्दी: हे धर्मबुद्धि! तुमने ठीक किया। पापबुद्धि की व्यर्थ चालाकी के कारण उसके पिता की आग में जलकर मृत्यु हो गई। इसलिए ठीक ही कहा गया है — बुद्धिमान व्यक्ति को उपाय (साधन) के बारे में सोचना चाहिए, और वैसे ही अपाय (संकट/दुष्परिणाम) के बारे में भी सोचना चाहिए।



