पाठ परिचय (Chapter Introduction)
यह नाट्यांश महाकवि विशाखदत्त के प्रसिद्ध नाटक मुद्राराक्षसम् से लिया गया है। इसमें चाणक्य और चन्दनदास के बीच संवाद है, जो मित्रता, राजधर्म, और नैतिक साहस को उजागर करता है। चन्दनदास अपने मित्र अमात्य राक्षस के परिवार को छिपाकर रखता है और चाणक्य के दबाव में भी उन्हें सौंपने से इनकार करता है।
संवादात्मक अनुवाद (Sanskrit + Hindi + Grammar)
| 📜 संस्कृत संवाद | 🇮🇳 हिंदी अनुवाद | 📚 व्याकरण संकेत |
|---|---|---|
| चाणक्यः – वत्स! मणिकारश्रेष्ठिनं चन्दनदासमिदानीं द्रष्टुमिच्छामि। | वत्स! मैं अभी मणियों के श्रेष्ठ व्यापारी चन्दनदास से मिलना चाहता हूँ। | इच्छामि – लट् लकार, प्रथम पुरुष |
| शिष्यः – तथेति। (निष्क्रम्य चन्दनदासेन सह प्रविश्य) इतः इतः श्रेष्ठिन्! | ठीक है। (बाहर जाकर चन्दनदास के साथ प्रवेश करता है) इधर आइए श्रेष्ठी! | निष्क्रम्य – कृदन्त, ल्यप् प्रत्यय |
| शिष्यः – उपाध्याय! अयं श्रेष्ठी चन्दनदासः। | आचार्य! यह हैं श्रेष्ठी चन्दनदास। | अयं – सर्वनाम, पुंलिंग |
| चन्दनदासः – जयत्वार्यः। | आर्य की जय हो। | जयतु – विधिलिं लकार |
| चाणक्यः – श्रेष्ठिन्! स्वागतं ते। अपि प्रचीयन्ते संव्यवहाराणां वृद्धिलाभाः? | श्रेष्ठी! आपका स्वागत है। क्या व्यापार में वृद्धि हो रही है? | स्वागतं – संधि: सु + आगतम् |
| चन्दनदासः – आर्यस्य प्रसादेन अखण्डिता मे वाणिज्या। | आर्य की कृपा से मेरा व्यापार निर्बाध चल रहा है। | अखण्डिता – नञ् तत्पुरुष समास |
| चाणक्यः – प्रीताभ्यः प्रकृतिभ्यः प्रतिप्रियमिच्छन्ति राजानः। | राजा लोग प्रसन्न व्यक्तियों से उपकार की अपेक्षा करते हैं। | प्रीताभ्यः – चतुर्थी बहुवचन |
| चन्दनदासः – आज्ञापयतु आर्यः, किं कियत् च अस्मज्जनादिष्यते इति। | आज्ञा दीजिए आर्य, क्या और कितना अपेक्षित है? | कियत् – प्रश्नवाचक विशेषण |
| चाणक्यः – चन्द्रगुप्तराज्यमिदं न नन्दराज्यम्। नन्दस्यैव अर्थसम्बन्धः प्रीतिमुत्पादयति। चन्द्रगुप्तस्य तु भवतामपरिक्लेश एव। | यह चन्द्रगुप्त का राज्य है, न कि नन्द का। नन्द का राज्य धन से प्रेम करता था, चन्द्रगुप्त का राज्य आपके सुख से। | नन्दस्यैव – संधि: नन्दस्य + एव |
| चन्दनदासः – आर्य! अनुगृहीतोऽस्मि। | आर्य! मैं आपका आभारी हूँ। | अनुगृहीतोऽस्मि – पूर्वरूप संधि |
| चाणक्यः – स चापरिक्लेशः कथमाविर्भवति इति ननु भवता प्रष्टव्यः स्मः। | यह सुख कैसे प्राप्त होता है, यह आपसे पूछा जाना चाहिए था। | प्रष्टव्यः – तव्यत् प्रत्यय |
| चन्दनदासः – आज्ञापयतु आर्यः। | आज्ञा दीजिए आर्य। | विधिलिं लकार |
| चाणक्यः – राजनि अविरुद्धवृत्तिर्भव। | राजा के प्रति विरोधी मत बनिए। | भव – आदेशात्मक प्रयोग |
| चन्दनदासः – आर्य! कः पुनरधन्यो राज्ञो विरुद्ध इति आर्येणावगम्यते? | आर्य! कौन अभागा राजा के विरुद्ध है, ऐसा आप मानते हैं? | कः – प्रश्नवाचक सर्वनाम |
| चाणक्यः – भवानेव तावत् प्रथमम्। | सबसे पहले आप ही। | भवन् – सम्मानसूचक सर्वनाम |
| चन्दनदासः – (कर्णी पिधाय) शान्तं पापम्, शान्तं पापम्। कीदृशस्तृणानामग्निना सह विरोधः? | (कानों को छूते हुए) क्षमा करें। सूखी घास का अग्नि से क्या विरोध? | उपमा अलंकार |
| चाणक्यः – अयमीदृशो विरोधः यत् त्वमद्यापि राजापथ्यकारिणोऽमात्यराक्षसस्य गृहजनं स्वगृहे रक्षसि। | यह विरोध इस प्रकार का है कि तुम आज भी राजा के विरोधी अमात्य राक्षस के परिवार को अपने घर में छिपाकर रखे हुए हो। | अद्यापि – संधि: अद्य + अपि |
| चन्दनदासः – आर्य! अलीकमेतत्। केनाप्यनार्येण आर्याय निवेदितम्। | आर्य! यह असत्य है। किसी दुष्ट ने आपको यह बताया है। | अलीकम् – असत्य, नपुंसक लिंग |
| चाणक्यः – अलमाशङ्कया। भीताः पूर्वराजपुरुषाः पौराणामिच्छतामपि गृहेषु गृहजनं निक्षिप्य देशान्तरं व्रजन्ति। ततस्तत्प्रच्छादनं दोषमुत्पादयति। | भयभीत पूर्वराजकर्मी नगरवासियों की इच्छा के बावजूद अपने घरों में अमात्य के परिवार को छिपाकर देश छोड़ देते हैं। यह छिपाना ही दोष उत्पन्न करता है। | निक्षिप्य – कृदन्त, ल्यप् प्रत्यय |
| चन्दनदासः – तस्मिन् समये आसीदस्मद्गृहे अमात्यराक्षसस्य गृहजन इति। | उस समय मेरे घर में अमात्य राक्षस का परिवार था। | आसीत् – लङ् लकार, भूतकाल |
| चाणक्यः – पूर्वम् ‘अनृतम्’, इदानीम् “आसीत्” इति परस्परविरुद्धे वचने। | पहले कहा “नहीं था”, अब कहते हैं “था”—यह विरोधाभास है। | अनृतम् – असत्य |
| चन्दनदासः – आर्य! तस्मिन् समये आसीदस्मद्गृहे अमात्यराक्षसस्य गृहजन इति। | आर्य! उस समय था। | पुनरुक्ति – दोहराव |
| चाणक्यः – इदानीं कुत्र गतः? | अब कहाँ गया? | कुत्र – प्रश्नवाचक अव्यय |
| चन्दनदासः – न जानामि। | मुझे नहीं पता। | जानामि – लट् लकार, प्रथम पुरुष |
| चाणक्यः – कथं न जानासि? | कैसे नहीं जानते? | कथं – प्रश्नवाचक अव्यय |
| चन्दनदासः – आर्य! किम् मे भयं दर्शयसि? सन्तमपि गेहे अमात्यराक्षसस्य गृहजनं न समर्पयामि, किम् पुनरसन्तम्? | आर्य! आप मुझे भय क्यों दिखा रहे हैं? यदि वे मेरे घर में होते तो भी मैं उन्हें नहीं सौंपता, तो अब जब वे नहीं हैं, तो कैसे सौंप सकता हूँ? | समर्पयामि – लट् लकार, उत्तम पुरुष |
| चाणक्यः – किमेतत् निश्चितं? | क्या यही निश्चित है? | निश्चितं – क्तप्रत्यय |
| चन्दनदासः – एषा मे निश्चिता वृत्तिः। | हाँ, यही मेरी निश्चित प्रवृत्ति है। | निश्चिता – स्त्रीलिंग विशेषण |
| चाणक्यः – साधु! चन्दनदास, त्वं साधु:। | बहुत अच्छा! चन्दनदास, तुम सज्जन हो। | साधु – विशेषण |
श्लोक + भावार्थ + व्याकरण
श्लोक: सुलभेष्वर्थलाभेषु परसंवेदने जने। इदं दुष्करं कुर्यादिदानीं शिविना विना॥
हिंदी भावार्थ: जब धन प्राप्त करना आसान हो, तब भी दूसरों की वस्तु की रक्षा करना कठिन कार्य है। यह कार्य राजा शिवि के अलावा कोई नहीं कर सकता था—लेकिन अब चन्दनदास ने यह कार्य कर दिखाया है।
व्याकरण विश्लेषण:
- समास: परसंवेदने जने – बहुव्रीहि समास
- लकार: कुर्यात् – विधिलिं लकार
- प्रत्यय: सुलभेषु – सु + लभ + षु (सप्तमी बहुवचन)
छात्रों के लिए अभ्यास बिंदु
शब्दार्थ अभ्यास
- वत्स – पुत्र
- मणिकारश्रेष्ठिनम् – रत्नों का व्यापारी
- प्रचीयन्ते – बढ़ रहे हैं
- अखण्डिता – बिना बाधा के
व्याकरण अभ्यास
- संधि-विच्छेद: स्वागतं = सु + आगतम्
- समास: अत्यादरः = अति + आदर (तत्पुरुष)
- लकार पहचान: इच्छामि – लट् लकार, प्रथम पुरुष
रचनात्मक लेखन
- “राजधर्म बनाम व्यक्तिगत धर्म” पर निबंध
- “मित्रता की शक्ति” पर अनुच्छेद
श्लोक पुनरावृत्ति + भावार्थ
श्लोक: सुलभेष्वर्थलाभेषु परसंवेदने जने। इदं दुष्करं कुर्यादिदानीं शिविना विना॥
हिंदी भावार्थ: जब धन प्राप्त करना आसान हो, तब भी दूसरों की वस्तु की रक्षा करना कठिन कार्य है। यह कार्य राजा शिवि के अलावा कोई नहीं कर सकता था—लेकिन अब चन्दनदास ने यह कार्य कर दिखाया है।
छात्रों के लिए अंतिम अभ्यास बिंदु
व्याकरण अभ्यास
- क्रियापद पहचानें: जानामि, दर्शयसि, समर्पयामि
- प्रश्नवाचक अव्यय: कुत्र, कथं, किम्
- विशेषण: निश्चिता, साधु
रचनात्मक लेखन
- “मित्रता और नैतिकता का टकराव” पर विचार लेख
- “राजनीति में व्यक्तिगत निष्ठा का स्थान” पर निबंध
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