चतुर्थः पाठः — जननी तुल्यवत्सला (शेमुषी भाग-2, कक्षा 10) — अभ्यास प्रश्नोत्तर (संस्कृत व हिन्दी)
पाठ-परिचय (Extra Info)
प्रस्तुत पाठ महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित ऐतिहासिक ग्रन्थ महाभारत के ‘वनपर्व’ से गृहीत है। यह कथा सभी प्राणियों में समदृष्टि-भावना को जगाती है। इसका अभीप्सित अर्थ यह है कि समाज में विद्यमान दुर्बल प्राणियों के प्रति भी माता का वात्सल्य विशेष रूप से होता है। कथा में एक किसान द्वारा दुर्बल बैल को कष्ट दिए जाने पर गोमाता सुरभि रो पड़ती हैं; इन्द्र के पूछने पर वे बताती हैं कि यद्यपि माता सब सन्तानों से समान प्रेम करती है, परन्तु दुर्बल सन्तान पर उसकी कृपा स्वाभाविक रूप से अधिक होती है।
अभ्यास 1 — एकपदेन उत्तरं लिखत
प्रश्न: वृषभः दीनः इति जानन्नपि कः तं नुदन् आसीत्?
उत्तर (संस्कृत): कृषकः तं नुदन् आसीत्।
उत्तर (हिन्दी): किसान उसे (दुर्बल जानते हुए भी) धकेल रहा था।
प्रश्न: वृषभः कुत्र पपात?
उत्तर (संस्कृत): वृषभः क्षेत्रे पपात।
उत्तर (हिन्दी): बैल खेत में गिर गया।
प्रश्न: दुर्बले सुते कस्याः अधिका कृपा भवति?
उत्तर (संस्कृत): दुर्बले सुते मातुः अधिका कृपा भवति।
उत्तर (हिन्दी): दुर्बल पुत्र पर माता की अधिक कृपा होती है।
प्रश्न: कयोः एकः शरीरेण दुर्बलः आसीत्?
उत्तर (संस्कृत): तयोः बलीवर्दयोः एकः शरीरेण दुर्बलः आसीत्।
उत्तर (हिन्दी): उन दोनों बैलों में से एक शरीर से दुर्बल था।
प्रश्न: चण्डवातेन मेघरवैश्च सह कः समजायत?
उत्तर (संस्कृत): चण्डवातेन मेघरवैश्च सह प्रवर्षः समजायत।
उत्तर (हिन्दी): प्रचंड हवा और बादलों की गर्जना के साथ भारी वर्षा हुई।
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💬 Talk to a Counsellor Class 10 • Expert Faculty • Regular Tests • Doubt Supportअभ्यास 2 — अधोलिखितानां प्रश्नानाम् उत्तराणि संस्कृतभाषया लिखत
प्रश्न: कृषकः किं करोति स्म?
उत्तर (संस्कृत): कृषकः बलीवर्दाभ्यां क्षेत्रकर्षणं करोति स्म।
उत्तर (हिन्दी): किसान दो बैलों से खेत की जुताई कर रहा था।
प्रश्न: माता सुरभिः किमर्थम् अश्रूणि मुञ्चति स्म?
उत्तर (संस्कृत): स्वपुत्रं (दुर्बलं वृषभं) कृषकेण पीड्यमानं भूमौ पतितं च दृष्ट्वा माता सुरभिः अश्रूणि मुञ्चति स्म।
उत्तर (हिन्दी): अपने पुत्र (दुर्बल बैल) को किसान द्वारा सताया जाता और भूमि पर गिरा हुआ देखकर माता सुरभि रो पड़ी।
प्रश्न: सुरभिः इन्द्रस्य प्रश्नस्य किमुत्तरं ददाति?
उत्तर (संस्कृत): सुरभिः प्रत्यवोचत् यत् यद्यपि तस्याः सहस्राधिकानि अपत्यानि सन्ति, सर्वेष्वपत्येषु जननी तुल्यवत्सला एव भवति, तथापि दुर्बले सुते मातुः कृपा सहजैव अभ्यधिका भवति।
उत्तर (हिन्दी): सुरभि ने उत्तर दिया कि यद्यपि उसके हज़ार से भी अधिक सन्तान हैं और माता सभी सन्तानों से समान प्रेम करती है, फिर भी दुर्बल पुत्र पर माता की कृपा स्वाभाविक रूप से अधिक होती है।
प्रश्न: मातुः अधिका कृपा कस्मिन् भवति?
उत्तर (संस्कृत): मातुः अधिका कृपा दुर्बले/दीने सुते भवति।
उत्तर (हिन्दी): माता की अधिक कृपा दुर्बल/दीन पुत्र पर होती है।
प्रश्न: इन्द्रः दुर्बलवृषभस्य कष्टानि अपाकर्तुं किं कृतवान्?
उत्तर (संस्कृत): इन्द्रः सुरभिम् असान्त्वयत्- ‘गच्छ वत्से! सर्वं भद्रं जायेत’ इति उक्त्वा चण्डवातेन मेघरवैश्च सह प्रवर्षं कारितवान्, येन कृषकः हर्षातिरेकेण कर्षणविमुखः सन् वृषभौ नीत्वा गृहम् अगात्।
उत्तर (हिन्दी): इन्द्र ने सुरभि को सांत्वना देते हुए कहा ‘हे पुत्री! जाओ, सब भला होगा’ और फिर प्रचंड आँधी तथा बादलों की गर्जना के साथ भारी वर्षा करवाई, जिससे प्रसन्न होकर किसान जुताई छोड़कर दोनों बैलों को घर ले गया।
प्रश्न: जननी कीदृशी भवति?
उत्तर (संस्कृत): जननी सर्वेष्वपत्येषु तुल्यवत्सला भवति, किन्तु पुत्रे दीने सा कृपार्द्रहृदया भवति।
उत्तर (हिन्दी): माता सभी सन्तानों के प्रति समान स्नेह रखने वाली होती है, परन्तु दीन (दुर्बल) पुत्र के प्रति उसका हृदय करुणा से द्रवित हो जाता है।
प्रश्न: पाठेऽस्मिन् कयोः संवादः विद्यते?
उत्तर (संस्कृत): पाठेऽस्मिन् सुरभेः इन्द्रस्य च संवादः विद्यते।
उत्तर (हिन्दी): इस पाठ में गोमाता सुरभि और इन्द्र का संवाद है।
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अभ्यास 3 — ‘क’ स्तम्भे दत्तानां पदानां मेलनं ‘ख’ स्तम्भे दत्तैः समानार्थकपदैः कुरुत
| क स्तम्भ (पदम्) | ख स्तम्भ (समानार्थकपदम्) |
| कृच्छ्रेण | काठिन्येन (कठिनाई से) |
| चक्षुर्भ्याम् | नेत्राभ्याम् (दोनों आँखों से) |
| जवेन | द्रुतगत्या (तीव्र गति से) |
| इन्द्रः | वासवः (इन्द्र) |
| पुत्राः | सुताः (पुत्र) |
| शीघ्रम् | अचिरम् (जल्दी) |
| बलीवर्दः | वृषभः (बैल) |
अभ्यास 4 — स्थूलपदमाधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत
| वाक्यम् (स्थूल/रेखांकित पद) | निर्मित प्रश्नः |
| सः कृच्छ्रेण भारम् उद्वहति। | सः कथं भारम् उद्वहति? |
| सुराधिपः ताम् अपृच्छत्। | कः ताम् अपृच्छत्? |
| अयम् अन्येभ्यो दुर्बलः। | अयं केभ्यः दुर्बलः? |
| धेनूनां माता सुरभिः आसीत्। | कासां माता सुरभिः आसीत्? |
| सहस्राधिकेषु पुत्रेषु सत्स्वपि सा दुःखी आसीत्। | केषु सत्स्वपि सा दुःखी आसीत्? |
अभ्यास 5 — रेखांकितपदे यथास्थानं सन्धिं विच्छेदं वा कुरुत
| रेखांकित पद | सन्धि / विच्छेद |
| कुर्वन्+आसीत् | कुर्वन्नासीत् (सन्धि) |
| तयोरेकः | तयोः + एकः (विच्छेद) |
| न+उत्थितः | नोत्थितः (सन्धि) |
| सत्स्वपि | सत्सु + अपि (विच्छेद) |
| तथा+अपि+अहम्+एतस्मिन् | तथाप्यहमेतस्मिन् (सन्धि) |
| बहूनि+अपत्यानि | बहून्यपत्यानि (सन्धि) |
| जलोपप्लवः | जल + उपप्लवः (विच्छेद) |
अभ्यास 6 — अधोलिखितेषु वाक्येषु रेखांकितं सर्वनामपदं कस्मै प्रयुक्तम्
| वाक्यम् (रेखांकित सर्वनाम) | किसके लिए प्रयुक्त |
| सा च अवदत् भो वासव! अहं भृशं दुःखिता अस्मि। | सा — सुरभये (सुरभि के लिए) |
| पुत्रस्य दैन्यं दृष्ट्वा अहम् रोदिमि। | अहम् — सुरभये (सुरभि के लिए) |
| सः दीनः इति जानन् अपि कृषकः तं पीडयति। | सः — कृषकाय (किसान के लिए) |
| मम बहूनि अपत्यानि सन्ति। | मम — सुरभये (सुरभि के लिए) |
| सः च ताम् एवम् असान्त्वयत्। | सः — इन्द्राय (इन्द्र के लिए) |
| सहस्रेषु पुत्रेषु सत्स्वपि तव अस्मिन् प्रीतिः अस्ति। | तव — सुरभये (सुरभि के लिए) |
अभ्यास 7 — ‘क’ स्तम्भे विशेषणपदं, ‘ख’ स्तम्भे विशेष्यपदम्। मेलनं कुरुत
| क स्तम्भ (विशेषणपदम्) | ख स्तम्भ (विशेष्यपदम्) |
| कश्चित् | कृषकः |
| दुर्बलम् | वृषभम् |
| क्रुद्धः | कृषीवलः |
| सहस्राधिकेषु | पुत्रेषु |
| अभ्यधिका | कृपा |
| विस्मितः | आखण्डलः |
| तुल्यवत्सला | जननी |
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अतिरिक्त — पाठ के महत्त्वपूर्ण श्लोक एवं हिन्दी अर्थ (Extra: Key Verses)
श्लोक 1 (सुरभिवचनम्)
विनिपातो न वः कश्चिद् दृश्यते त्रिदशाधिप!।
अहं तु पुत्रं शोचामि, तेन रोदिमि कौशिक!॥
हिन्दी अर्थ: हे देवराज! आप लोगों का कोई विनाश (कष्ट) नहीं दिख रहा। हे कौशिक (इन्द्र)! मैं तो अपने पुत्र के लिए शोक करती हूँ, इसीलिए रो रही हूँ।
श्लोक 2 (सुरभिवचनम्)
यदि पुत्रसहस्रं मे वात्सल्यं सर्वत्र सममेव मे।
दीने च तनये देव, प्रकृत्याडइयाधिका कृपा॥
हिन्दी अर्थ: हे देव! यद्यपि मेरे हज़ार पुत्र हैं और सबके प्रति मेरा वात्सल्य समान ही है, फिर भी दीन (दुर्बल) पुत्र के प्रति स्वभाव से ही अधिक कृपा होती है।
श्लोक 3 (उपसंहार)
अपत्येषु च सर्वेषु जननी तुल्यवत्सला।
पुत्रे दीने तु सा माता कृपार्द्रहृदया भवेत्॥
हिन्दी अर्थ: माता अपनी सभी सन्तानों के प्रति समान स्नेह रखने वाली होती है, परन्तु दीन (दुर्बल) पुत्र के प्रति उसका हृदय करुणा से द्रवित हो जाता है।
मातृमहत्त्वविषयक श्लोक (योग्यताविस्तार से)
नास्ति मातृसमा छाया, नास्ति मातृसमा गतिः।
नास्ति मातृसमं त्राणं, नास्ति मातृसमा प्रिया॥
— वेदव्यास
हिन्दी अर्थ: माता के समान न कोई छाया है, न कोई गति (सहारा) है, न कोई रक्षक है और न कोई प्रिय है।
उपाध्यायान्दशाचार्य आचार्येभ्यः शतं पिता।
सहस्रं तु पितॄन् माता, गौरवेणातिरिच्यते॥
— मनुस्मृति
हिन्दी अर्थ: दस उपाध्यायों से एक आचार्य श्रेष्ठ है, सौ आचार्यों से एक पिता श्रेष्ठ है, और सहस्र (हज़ार) पिताओं से भी माता गौरव में बढ़कर है।
माता गुरुतरा भूमेः, खात् पितोच्चतरस्तथा।
मनः शीघ्रतरं वातात्, चिन्ता बहुतरी तृणात्॥
— महाभारत
हिन्दी अर्थ: माता पृथ्वी से भी भारी (गुरुतर) है, पिता आकाश से भी ऊँचा है, मन वायु से भी तीव्र गति वाला है, और चिन्ताएँ तिनकों से भी अधिक हैं।
योग्यताविस्तार — सारांश (Extra Info)
महाभारत में ऐसे अनेक प्रसंग हैं जो आज भी उपादेय हैं। वनपर्व से ली गई यह कथा न केवल मनुष्यों अपितु सभी जीव-जन्तुओं के प्रति समदृष्टि पर बल देती है। यह कथा महाभारत, वनपर्व, दशम अध्याय, श्लोक संख्या 8 से 16 पर आधारित है। व्यास द्वारा धृतराष्ट्र को यह सन्देश दिया गया है कि पिता होने के नाते अपने पुत्रों के साथ-साथ भतीजों के हित का ध्यान रखना भी उचित है।
महाभारत के विषय में प्रसिद्ध श्लोक: ‘धर्मे अर्थे च कामे च मोक्षे च भरतर्षभ। यदिहास्ति तदन्यत्र यन्नेहास्ति न तत् क्वचित्॥’ अर्थात् धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के विषय में जो यहाँ है वह अन्यत्र भी मिल सकता है, परन्तु जो यहाँ नहीं है, वह कहीं भी उपलब्ध नहीं है।
भारतीय संस्कृति में गौ का महत्त्व अनादिकाल से रहा है। कामधेनु की अवधारणा यह दर्शाती है कि गाय में सभी इच्छित वस्तुएँ देने की क्षमता मानी गई है। कालिदास के रघुवंश में राजा दिलीप द्वारा ऋषि वशिष्ठ की कामधेनु ‘नन्दिनी’ की सेवा करके प्रतापी पुत्र प्राप्त करने की कथा भी प्रसिद्ध है।
अतिरिक्त — सम्पूर्ण शब्दार्थाः (Extra: Full Word Meanings)
| शब्दः | अर्थः |
| शब्दः | अर्थः |
| बलीवर्दाभ्याम् | दो बैलों से — By two bullocks |
| क्षेत्रकर्षणम् | खेत की जुताई — Plough the field |
| जवेन | तीव्र गति से — With speed |
| तोदनेन | कष्ट देने से — By torturing |
| नुदन् | धकेलता हुआ — Pulling |
| हलमूढ्वा | हल उठाकर/ढोकर — Carrying the plough |
| पपात | गिर गया — Fell down |
| कृषीवलः | किसान — Farmer |
| उत्थापयितुम् | उठाने के लिए — To uplift |
| वृषः | बैल — Bullock |
| धेनूनाम् | गायों की — Of cows |
| नेत्राभ्याम् | दोनों आँखों से — From both eyes |
| अश्रूणि | आँसू — Tears |
| आविरासन | सामने आ गए — Appeared |
| सुराधिपः | देवताओं के राजा (इन्द्र) — King of Gods |
| उच्यताम् | कहें, कहा जाए — Say |
| वासवः | इन्द्र — Indra |
| कृच्छ्रेण | कठिनाई से — With difficulty |
| इतरमिव | दूसरे (बैल) के समान — Like another bullock |
| धुरम् | जुए को — Yoke |
| वोढुम् | ढोने के लिए — To carry |
| प्रत्यवोचत् | जवाब दिया — Replied |
| नूनम् | निश्चय ही — Certainly |
| सहस्रम् | हज़ार — Thousand |
| वात्सल्यम् | वात्सल्य (प्रेमभाव) — Affection |
| अपत्यानि | सन्तान — Children |
| विशिष्य | विशेषकर — Specially |
| वेदनाम् | कष्ट को — The pain |
| तुल्यवत्सला | समान रूप से प्यार करने वाली — Equal affection |
| सुतः | पुत्र — Son |
| भृशम् | बहुत अधिक — Very much |
| आखण्डलस्य | इन्द्र का — Of Indra |
| असान्त्वयत् | सांत्वना दी (दिलासा दी) — Consoled |
| अचिरात् | शीघ्र ही — Soon |
| चण्डवातेन | प्रचंड (तीव्र) हवा से — With swift wind |
| मेघरवैः | बादलों के गर्जन से — Thundering |
| प्रवर्षः | वर्षा — Heavy rain |
| जलोपप्लवः | पानी द्वारा तबाही — Destruction by water |
| कर्षणविमुखः | जोतने के काम से विमुख होकर — Leaving ploughing work |
| वृषभौ | दोनों बैलों को — Both the bullocks |
| अगात् | गया — Went |
| त्रिदशाधिपः | देवताओं का राजा = इन्द्र — King of Gods |
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Class 11th Biology Chapter 2 Question Answer
Class 11th Biology Chapter 1 Question Answer
Difference Between JEE Main and JEE Advanced | Complete Guide for Students



