पाठ-परिचय (Extra Info)
प्रस्तुत पाठ ‘शिशुलालनम्’ दिङ्नाग द्वारा रचित संस्कृत नाट्यग्रन्थ ‘कुन्दमाला’ के पंचम अंक से संकलित है। इस नाटकांश में राम अपने पुत्रों लव-कुश को सिंहासन पर बैठाना चाहते हैं, किन्तु दोनों विनयपूर्वक मना कर देते हैं। सिंहासनारूढ़ राम दोनों के रूप-लावण्य को देखकर मुग्ध होकर उन्हें अपनी गोद में बिठा लेते हैं। पाठ में शिशु-वात्सल्य का मनोहारी वर्णन है।
नाट्य-प्रसंग
कुन्दमाला के लेखक दिङ्नाग ने रामकथा के करुण उत्तरार्ध की नाट्यीय सम्भावनाओं को मौलिकता से साकार किया है। इसी कथानक पर भवभूति का ‘उत्तररामचरित’ भी आधारित है। लव-कुश से मिलकर राम के हृदय में उनसे आलिंगन की लालसा जागती है और वे उन्हें अपने सिंहासन पर, अपनी गोद में बिठाकर स्नेह करते हैं।
अभ्यास 1 — एकपदेन उत्तरं लिखत
प्रश्न: कुशलवौ कम् उपसृत्य प्रणमतः?
उत्तर: कुशलवौ रामम् उपसृत्य प्रणमतः।
प्रश्न: तपोवनवासिनः कुशस्य मातरं केन नाम्ना आह्वयन्ति?
उत्तर: तपोवनवासिनः कुशस्य मातरं ‘देवी’ इति नाम्ना आह्वयन्ति।
प्रश्न: वयोऽनुरोधात् कः लालनीयः भवति?
उत्तर: वयोऽनुरोधात् शिशुजनः लालनीयः भवति।
प्रश्न: केन सम्बन्धेन वाल्मीकिः लवकुशयोः गुरुः?
उत्तर: उपनयनोपदेशेन (उपनयन-संस्कार की दीक्षा देने के कारण) वाल्मीकिः लवकुशयोः गुरुः।
प्रश्न: कुत्र लवकुशयोः पितुः नाम न व्यवह्रियते?
उत्तर: तपोवने लवकुशयोः पितुः नाम न व्यवह्रियते।
अभ्यास 2 — अधोलिखितानां प्रश्नानाम् उत्तराणि संस्कृतभाषया लिखत
प्रश्न: रामाय कुशलवयोः कण्ठाश्लेषस्य स्पर्शः कीदृशः आसीत्?
उत्तर: रामाय कुशलवयोः कण्ठाश्लेषस्य स्पर्शः हृदयग्राही आसीत्।
प्रश्न: रामः लवकुशौ कुत्र उपवेशयितुं कथयति?
उत्तर: रामः प्रथमं लवकुशौ स्वाङ्के (गोदे) उपवेशयति, ततः ‘अङ्कव्यवहितं सिंहासनम् अध्यास्यताम्’ इति कथयित्वा अङ्कव्यवहितं (मध्ये अपने को रखकर) सिंहासने उपवेशयितुं कथयति।
प्रश्न: बालभावात् हिमकरः कुत्र विराजते?
उत्तर: बालभावात् हिमकरः (चन्द्रमा) पशुपतेः (शिवस्य) मस्तके केतकच्छदरूपेण विराजते।
प्रश्न: कुशलवयोः वंशस्य कर्ता कः?
उत्तर: कुशलवयोः वंशस्य कर्ता भगवान् सहस्रदीधितिः (सूर्यः) अस्ति।
प्रश्न: कुशलवयोः मातरं वाल्मीकिः केन नाम्ना आह्वयति?
उत्तर: कुशलवयोः मातरं वाल्मीकिः ‘वधूः’ इति नाम्ना आह्वयति।
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💬 Talk to a Counsellor Class 10 • Expert Faculty • Regular Tests • Doubt Supportअभ्यास 3 — रेखांकितेषु पदेषु विभक्तिं तत्कारणं च निर्दिशत
| वाक्यम् / रेखांकित पद | विभक्तिः | तत्कारणम् |
| राजन्! अलम् अतिदाक्षिण्येन। (उदाहरण) | तृतीया | ‘अलम्’ योगे |
| रामः लवकुशौ आसनार्धम् उपवेशयति। | द्वितीया | ‘उपवेशयति’ क्रिया का कर्म होने से |
| धिङ् माम् एवं भूतम्। | द्वितीया | ‘धिक्’ योगे |
| अङ्कव्यवहितम् अध्यास्यतां सिंहासनम्। | प्रथमा | ‘अध्यास्यताम्’ क्रिया का कर्ता होने से |
| अलम् अतिविस्तरेण। | तृतीया | ‘अलम्’ योगे |
| रामम् उपसृत्य प्रणम्य च। | द्वितीया | ‘उपसृत्य’ (उप + सृ) क्रिया का कर्म होने से |
अभ्यास 4 — यथानिर्देशम् उत्तरत
प्रश्न: ‘जानाम्यहं तस्य नामधेयम्’ अस्मिन् वाक्ये कर्तृपदं किम्?
उत्तर: इस वाक्य में कर्तृपद ‘अहम्’ है।
प्रश्न: ‘किं कुपिता एवं भणति उत प्रकृतिस्था’ — अस्मात् वाक्यात् ‘हर्षिता’ इति पदस्य विपरीतार्थकपदं चित्वा लिखत।
उत्तर: ‘हर्षिता’ का विपरीतार्थक पद ‘कुपिता’ है।
प्रश्न: विदूषकः (उपसृत्य) ‘आज्ञापयतु भवान्!’ अत्र भवान् इति पदं कस्मै प्रयुक्तम्?
उत्तर: ‘भवान्’ पद राम (राजा) के लिए प्रयुक्त हुआ है।
प्रश्न: ‘तस्मादङ्क-व्यवहितम् अध्यास्यतां सिंहासनम्’ — अत्र क्रियापदं किम्?
उत्तर: इस वाक्य में क्रियापद ‘अध्यास्यताम्’ है।
प्रश्न: ‘वयस्तु न किञ्चिदन्तरम्’ — अत्र ‘आयुषः’ इत्यर्थे किं पदं प्रयुक्तम्?
उत्तर: ‘आयुष:’ के अर्थ में ‘वयः’ पद प्रयुक्त हुआ है।
अभ्यास 5 — अधोलिखितानि वाक्यानि कः कं प्रति कथयति
| वाक्यम् | कः (वक्ता) | कम् प्रति (श्रोता) |
| सव्यवधानं न चारित्र्यलोपाय। | रामः | लवकुशौ प्रति |
| किं कुपिता एवं भणति, उत प्रकृतिस्था? | विदूषकः | कुशं प्रति |
| जानाम्यहं तस्य नामधेयम्। | कुशः | रामं प्रति |
| तस्या द्वे नाम्नी। | लवः | विदूषकं प्रति |
| वयस्य! अपूर्वं खलु नामधेयम्। | रामः | कुशं प्रति |
अभ्यास 6 (अ) — मञ्जूषातः पर्यायद्वयं चित्वा लिखत
| शब्दः | पर्याय 1 | पर्याय 2 |
| हिमकरः | शशिः | निशाकरः |
| सम्प्रति | इदानीम् | अधुना |
| समुदाचारः | शिष्टाचारः | सदाचारः |
| पशुपतिः | शिवः | चन्द्रशेखरः |
| तनयः | सुतः | पुत्रः |
| सहस्रदीधितिः | सूर्यः | भानुः |
अभ्यास 6 (आ) — विशेषण-विशेष्यपदानि योजयत
| विशेषणपदम् | विशेष्यपदम् |
| उदात्तरम्यः | समुदाचारः |
| अतिदीर्घः | प्रवासः |
| समरूपः | कुटुम्बवृत्तान्तः |
| हृदयग्राही | स्पर्शः |
| कुमारयोः | कुशलवयोः |
अभ्यास 7 (क) — अधोलिखितपदेषु सन्धिं कुरुत
| पदद्वयम् | सन्धियुक्त पद |
| द्वयोः + अपि | द्वयोरपि |
| द्वौ + अपि | द्वावपि |
| कः + अत्र | कोऽत्र |
| अनभिज्ञः + अहम् | अनभिज्ञोऽहम् |
| इति + आत्मानम् | इत्यात्मानम् |
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अभ्यास 7 (ख) — अधोलिखितपदेषु विच्छेदं कुरुत
| सन्धियुक्त पद | विच्छेद |
| अहमप्येतयोः | अहम् + अपि + एतयोः |
| वयोऽनुरोधात् | वयः + अनुरोधात् |
| समानाभिजनौ | समान + अभिजनौ |
| खल्वेतत् | खलु + एतत् |
अतिरिक्त — महत्त्वपूर्ण शब्दार्थाः (Extra: Key Word Meanings)
| शब्दः | अर्थः |
| पितामहः | पिता के पिता — Grand father |
| सहस्रदीधितिः | सूर्य — The sun |
| कण्ठाश्लेषस्य | गले लगाने का — Hug |
| परिष्वज्य | आलिंगन करके — Embracing |
| विचिन्त्य | विचार करके — Considering |
| अध्यासितुम् | बैठने के लिए — To sit |
| सव्यवधानम् | रुकावट सहित — With obstruction |
| अध्यास्यताम् | बैठिये — Be seated |
| अलमतिदाक्षिण्येन | अत्यधिक कुशलता न करें — Leave aside the excessive adroitness |
| अङ्कम् | गोद में — Lap |
| हिमकरः | चन्द्रमा — The moon |
| पशुपतिः | शिव — Lord Shiva |
| केतकच्छदत्वम् | केतकी (केवड़े) के पुष्प से बनी मस्तक की शोभा — Crown of screw-flower |
| स्वगतम् | मन ही मन — Inner self |
| समानाभिजनौ | एक कुल में पैदा होने वाले — Belonging to same family |
| संवृत्तौ | हो गये — Both became |
| प्रतिवचनम् | उत्तर — Reply |
| सोदर्यौ | सगे भाई — Real brothers/Twins |
| शरीरसन्निवेशः | शरीर की बनावट — Body structure |
| उदात्तरम्यः | अत्यधिक मनोहर — Very fascinating |
| समुदाचारः | शिष्टाचार — Good etiquette |
| उपनयनोपदेशेन | उपनयन की दीक्षा के कारण — By giving upanayana teaching |
| नामधेयम् | नाम — Name |
| निरनुक्रोशः | दया रहित — Unkind |
| वयस्य | मित्र — Friend |
| भणति | कहता है — Says |
| अम्बा | माता — Mother |
| प्रकृतिस्था | स्वाभाविक रूप से — In normal condition |
| अधिक्षिपति | फटकारती है — Snubs |
| चापलम् | चंचलता — Fickleness |
| अवमानिता | अपमानित — Insulted |
| दारकौ | दो पुत्रों को — Both sons |
| निर्भर्त्सयति | धमकाती है — Scolds |
| निःश्वस्य | दीर्घ श्वास लेकर — Sighing |
| स्वापत्यम् | अपनी सन्तान को — To own children |
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