संस्कृत साहित्य भारतीय संस्कृति और ज्ञान का अमूल्य भंडार है। कक्षा 12 के प्रथम अध्याय में हमें धर्म, सत्य, आचार और जीवन‑मूल्यों की शिक्षा मिलती है। यह अध्याय केवल भाषा‑अध्ययन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमें जीवन जीने की कला भी सिखाता है। इसमें वर्णित श्लोक हमें बताते हैं कि सत्य और धर्म ही जीवन का आधार हैं, और इन्हीं से समाज में शांति, सद्भावना तथा आत्मिक उन्नति संभव है। इस अध्याय का अध्ययन छात्रों को न केवल संस्कृत भाषा में दक्ष बनाता है, बल्कि उन्हें नैतिकता और जीवन‑मूल्यों की ओर भी प्रेरित करता है।
Ncert Book For Class 12 Bhaswati | Chapter 1 – अनुशासनम्
वेदमनूच्याचार्योऽन्तेवासिनमनुशास्ति। सत्यं वद। धर्मं चर। स्वाध्यायान्मा प्रमदः। आचार्याय प्रियं धनमाहृत्य प्रजातन्तुं मा व्यवच्छेत्सीः। सत्यात् न प्रमदितव्यम्। धर्मात् न प्रमदितव्यम्।
कुशलात् न प्रमदितव्यम्। भूत्यै न प्रमदितव्यम्। स्वाध्याय-प्रवचनाभ्यां न प्रमदितव्यम्। देवपितृकार्याभ्यां न प्रमदितव्यम्। मातृदेवो भव। पितृदेवो भव। आचार्यदेवो भव। अतिथिदेवो भव।
यान्यनवद्यानि कर्माणि, तानि सेवितव्यानि, नो इतराणि। यान्यस्माकं सुचरितानि, तानि त्वयोपास्यानि, नो इतराणि। ये के चास्मच्छ्रेयांसः ब्राह्मणाः, तेषां त्वयाऽसनेन प्रश्वसितव्यम्।
श्रद्धया देयम्। अश्रद्धया अदेयम्। श्रिया देयम्। ह्रिया देयम्। भिया देयम्। संविदा देयम्। एष आदेशः। एष उपदेशः। एषा वेदोपनिषत्। एतदनुशासनम्। एवमुपासितव्यम्। एवं चैतदुपास्यम्॥
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हिन्दी अनुवाद
वेदों का अध्ययन कराने के बाद आचार्य (गुरु) अपने शिष्य को यह उपदेश देता है—
सत्य बोलो। धर्म का आचरण करो। स्वाध्याय (अध्ययन) में कभी आलस्य मत करो। गुरु को प्रिय लगने वाला धन (गुरुदक्षिणा) अर्पित करके गृहस्थ जीवन की परंपरा को मत तोड़ो। सत्य से कभी विमुख मत होना। धर्म से कभी विमुख मत होना।
कल्याणकारी कार्यों से विमुख मत होना। समृद्धि और उन्नति के लिए प्रयत्न करने में प्रमाद मत करना। अध्ययन और अध्यापन (स्वाध्याय तथा प्रवचन) में कभी शिथिलता मत बरतना। देवताओं और पितरों से संबंधित कर्तव्यों की उपेक्षा मत करना।
माता को देवता के समान मानो। पिता को देवता के समान मानो। गुरु को देवता के समान मानो। अतिथि को देवता के समान मानो।
जो कर्म दोषरहित और उत्तम हैं, उन्हीं का पालन करना, अन्य का नहीं। हमारे जो श्रेष्ठ आचरण हैं, उन्हीं का अनुसरण करना, अन्य का नहीं। जो हमसे श्रेष्ठ और विद्वान ब्राह्मण हैं, उनका आदर-सत्कार करना।
श्रद्धा के साथ दान देना। बिना श्रद्धा के दान नहीं देना। समृद्धि के अनुसार दान देना। विनम्रता के साथ दान देना। भय (कर्तव्य-बोध) के साथ दान देना। समझदारी और सद्भावना के साथ दान देना।
यही आदेश है। यही उपदेश है। यही वेदों का रहस्य (उपनिषद्) है। यही अनुशासन है। इसी प्रकार आचरण करना चाहिए और इसी प्रकार इसका पालन करना चाहिए।॥
पाठ में प्रयुक्त महत्वपूर्ण सन्धियाँ एवं उनका सन्धिविच्छेद
सन्धिविच्छेदः
1. आचार्योऽन्तेवासिनम् → आचार्यः + अन्तेवासिनम्
2. स्वाध्यायान्मा → स्वाध्यायात् + मा
3. व्यवच्छेत्सीः → वि + अवच्छेत्सीः
4. सत्यात् → सत्यात् + न
5. यान्यनवद्यानि → यानि + अनवद्यानि
6. यान्यस्माकम् → यानि + अस्माकम्
7. त्वयोपास्यानि → त्वया + उपास्यानि
8. वेदोपनिषत् → वेद + उपनिषत्
9. चैतदुपास्यम् → च + एतत् + उपास्यम्
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