परिचय (Introduction – मातुराज्ञा गरीयसी, कक्षा 12 संस्कृत)
- पाठ का नाम – मातुराज्ञा गरीयसी का अर्थ है माता की आज्ञा सबसे श्रेष्ठ है।
- मुख्य विषय – इस अध्याय में बताया गया है कि माता की आज्ञा का पालन करना संतान का परम कर्तव्य है।
- संदेश – माता का आदेश केवल पारिवारिक अनुशासन ही नहीं, बल्कि जीवन में सफलता और नैतिकता का आधार है।
- शिक्षा – यह पाठ हमें सिखाता है कि माता‑पिता के प्रति सम्मान और आज्ञापालन से ही जीवन में शांति और उन्नति संभव है।
- छात्रों के लिए महत्व – संस्कृत साहित्य के माध्यम से यह अध्याय छात्रों को न केवल भाषा का ज्ञान देता है, बल्कि उन्हें संस्कार और जीवन‑मूल्यों की ओर भी प्रेरित करता है।
अध्याय का सार
- माता की आज्ञा का पालन करना संतान का सबसे बड़ा धर्म है।
- यह पाठ अनुशासन, कर्तव्य और भक्ति का महत्व समझाता है।
- इसमें जीवन के नैतिक मूल्यों को सरल भाषा और श्लोकों के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है।
- छात्रों को यह संदेश मिलता है कि माता‑पिता का सम्मान करना ही सच्ची सफलता और धर्म है।
class 12 sanskrit chapter 2 hindi translation
1.
काञ्चुकीयः :
परिवार परिचर्या कुमार!
रामः :
आर्य! कः परिवारः?
हिन्दी अनुवाद :
काञ्चुकीय कहता है – हे कुमार! परिवार (राजकीय समाचार) सुनिए।
राम कहते हैं – आर्य! कौन-सा समाचार?
2.
रामः :
महाराज! इति आर्येण नु वृत्तान्तस्य पृच्छामि। एषागरीयं वन्दिनीया पृथिवी स्वीकृतवती अथवा पुनः उत्पन्नोदयं दोषम्?
हिन्दी अनुवाद :
राम कहते हैं – हे आर्य! मैं महाराज का समाचार पूछ रहा हूँ। क्या पूजनीय पृथ्वी (सीता) को स्वीकार कर लिया गया है अथवा कोई नया दोष उत्पन्न हो गया है?
3.
रामः :
स्वजनमिति हन्त! नास्मि प्रतिकारः।
शरीरार्धेन सह हृदये व्यवस्यता।
कथं स्वजनशोकोऽपि न लज्जामपावयति।
हिन्दी अनुवाद :
राम कहते हैं – हाय! अपने लोगों के विषय में मैं कुछ भी नहीं कर पा रहा हूँ। वे मेरे हृदय में मेरे शरीर के आधे भाग के समान बसे हुए हैं। फिर भी अपने प्रियजनों का शोक मुझे लज्जित नहीं करता।
4.
काञ्चुकीयः :
तत् भवतः केकेयकः।
रामः :
किमवदात्, तेन हि उत्कृष्टो गुणेन भवितव्यम्।
हिन्दी अनुवाद :
काञ्चुकीय कहता है – वह केकय देश का व्यक्ति है।
राम कहते हैं – उसने क्या कहा? अवश्य ही वह श्रेष्ठ गुणों वाला होगा।
5.
रामः :
श्रूयताम्।
श्लोकः
यस्याः शुक्रमणे भर्ता मया पुत्री च या।
फलैः कुसुमैः स्फुटा तस्या चेतनापि करिष्यति॥
हिन्दी अनुवाद :
सुनो। जिस स्त्री का पति और पुत्र उसके लिए जीवन का आधार हों, वह पुष्पों और फलों से युक्त वृक्ष की भाँति जीवन में चेतना और आनंद प्रदान करती है।
6.
काञ्चुकीयः :
कुमार! अल्पपुण्यतया जीवितधर्म स्वभाव एव तस्य एवं खलु वचनम् भावयन्ती निवृत्ता।
हिन्दी अनुवाद :
हे कुमार! दुर्भाग्यवश जीवन का स्वभाव ही ऐसा है। ऐसा विचार करके वह वहाँ से लौट गई।
7.
रामः :
आर्य! पुनः उच्यताम्।
काञ्चुकीयः :
कथमिव?
रामः :
श्रूयताम्।
हिन्दी अनुवाद :
राम कहते हैं – आर्य! कृपया फिर से कहिए।
काञ्चुकीय पूछता है – कैसे?
राम कहते हैं – सुनिए।
8.
श्लोकः
वनमपि निबिडिते पार्श्वचर्येण ताव-
न्मम प्रियवतसा बालभावः स एव।
नवजलधवलैर्धर्मैर्जीवितं श्रद्धा यजन्ते।
मम च न परिभोगेच्छा भारती पीडा॥
हिन्दी अनुवाद :
वन में रहते हुए भी मेरे मन में वही स्नेह और सरलता बनी हुई है। धर्ममय जीवन ही मेरे लिए प्रिय है और भोग-विलास की इच्छा नहीं है।
9.
रामः :
अहो! ममातृवत्सल्यम्।
हिन्दी अनुवाद :
राम कहते हैं – अहो! मेरी माता के प्रति कितना स्नेह है।
10.
काञ्चुकीयः :
ततस्तामेव शोकावेगवती राजा हस्तेन विसर्जितः।
किञ्चिदवगम्य पथ्ये गृहे च पुनरागतः॥
हिन्दी अनुवाद :
उसके बाद शोक से व्याकुल राजा ने उसे विदा कर दिया और कुछ समझ-बूझकर अपने घर लौट आए।
11. (पद्यांश)
कथं कथं मोहप्रभुतः इति
यथा न सहते राजा मोहं धुनः सुताम् तदा व्यथा।
हिन्दी अनुवाद :
कैसा आश्चर्य है कि मोह कितना प्रबल होता है! जैसे राजा अपनी पुत्री के वियोग का दुःख सहन नहीं कर पाता, वैसे ही उसे अत्यन्त पीड़ा होती है।
12. (पद्यांश)
लक्ष्मणः (सस्वेदम्) :
कथं कथं मोहप्रभुतः इति।
यदि न सहते राजा मोहं धुनः सुतां मा वधाम्।
स्वजननिर्मुक्तः स्वयंवेद्यं दुःखं पर्येति।
अथ न खलु मुख्यं तु भावः कर्तव्यम्।
युवतिरहिते लोके कथं यशःश्लाघिता वयम्॥
हिन्दी अनुवाद :
लक्ष्मण कहते हैं – सचमुच मोह बहुत प्रबल होता है। यदि राजा अपनी पुत्री के वियोग का दुःख भी सहन नहीं कर सकता, तो साधारण मनुष्य की क्या स्थिति होगी? अपने प्रियजनों से अलग होकर व्यक्ति स्वयं ही दुःख का अनुभव करता है। इसलिए केवल भावनाएँ ही नहीं, बल्कि कर्तव्य का पालन भी आवश्यक है। यदि संसार में स्त्रियाँ न हों, तो मानव जीवन की प्रतिष्ठा और गौरव भी समाप्त हो जाएँगे।
13.
सीता :
आर्यपुत्र! सौमित्रेः काले सौमित्रिणा बहुधा अपूर्वः हृदयव्यथाम्।
रामः :
सुमन्त्र! किमिदम्?
हिन्दी अनुवाद :
सीता कहती हैं – आर्यपुत्र! लक्ष्मण ने समय-समय पर अनेक बार अपने हृदय की पीड़ा व्यक्त की है।
राम कहते हैं – हे सुमन्त्र! यह क्या बात है?
14.
लक्ष्मणः :
कथं कथं किमिवेदं नाम।
क्रमागते तु राज्ये पुनः शोकस्यैव नुचः।
इत्थमपि स्वहृदये किं क्षमा निर्मीयते॥
हिन्दी अनुवाद :
लक्ष्मण कहते हैं – यह कैसी विचित्र स्थिति है? राज्य प्राप्त होने के बाद भी शोक समाप्त नहीं हो रहा। ऐसी परिस्थितियों में मनुष्य के हृदय में धैर्य और क्षमा कैसे उत्पन्न हो सकती है?
15.
रामः :
सुमन्त्र! अस्मद्वंशदोषो भवतः उद्योगो जनयति।
अतः अपण्डितः खलु भवति।
हिन्दी अनुवाद :
राम कहते हैं – हे सुमन्त्र! हमारे वंश का यह दोष ही तुम्हें इतना चिंतित कर रहा है। इसी कारण व्यक्ति कभी-कभी विवेकहीन भी हो जाता है।
16.
रामः :
स्मरतु वा भवेद् राजा वयं वा नु तत्समम्।
यदि तादृशी धृतिशाला स राजा परिशीलयताम्॥
हिन्दी अनुवाद :
राम कहते हैं – चाहे राजा हमें याद करे या न करे, यह समान बात है। यदि वह इतना धैर्यवान है, तो उसे अपने कर्तव्य का पालन करते रहना चाहिए।
17.
लक्ष्मणः :
न च श्रमोऽपि रोषं धारयितुं प्रभवः।
भवतु भवतु गच्छामस्तावत्।
हिन्दी अनुवाद :
लक्ष्मण कहते हैं – अब मुझमें क्रोध को रोकने की शक्ति भी नहीं रही। अच्छा, अब चलें।
18.
रामः :
शैलोऽयं वस्तुभूमिर्ललितपुष्पसंकुला।
शुभदर्शनीयया स्थित्या व्यवस्थितम्॥
हिन्दी अनुवाद :
राम कहते हैं – यह पर्वतभूमि अत्यन्त सुन्दर है। यह मनोहर पुष्पों से सुसज्जित है और अपनी सुंदरता के कारण देखने योग्य प्रतीत होती है।
19.
रामः :
भवतः देशभूमित्वात् मेघवर्णोऽपि हृदया उत्पलनीलिमानि।
ताते पुनः यदि सत्यमपेक्ष्य कारणे।
हिन्दी अनुवाद :
राम कहते हैं – इस प्रदेश की भूमि और वातावरण के कारण बादलों का रंग भी कमल के समान नीला प्रतीत होता है। यदि सत्य की दृष्टि से देखा जाए तो इसका विशेष कारण है।
20. (श्लोक)
रामः :
फुल्लानी मारुतोऽयं शरदृतौ हसन्त्याम्।
तोषेण बाह्यमपि हृदयं हनाति।
किं शोभना रुचिरा विपुला पातवेषा॥
हिन्दी अनुवाद :
शरद ऋतु में खिले हुए फूलों और मंद पवन का सौंदर्य ऐसा है कि वह बाहरी ही नहीं, आन्तरिक हृदय को भी आनन्दित कर देता है। प्रकृति की यह शोभा अत्यन्त मनोहर और आकर्षक है।
21. (समाप्ति श्लोक)
लक्ष्मणः (सहर्षम्) :
हा हन्त! अस्मान् विदिश्याप्यलसः।
यत्कृतो महति क्लेशे राज्ये मे न मान्यते।
वर्षाणि दीर्घं वस्तव्यं यदिहैव न वेद्मि॥
हिन्दी अनुवाद :
लक्ष्मण कहते हैं – हाय! यह अत्यन्त दुःखद है कि इतना कष्ट सहने के बाद भी मुझे राज्य में उचित सम्मान नहीं मिला। अनेक वर्षों तक यहाँ रहना पड़ेगा, यह भी मुझे पहले ज्ञात नहीं था।



