कृतं प्रतिकृतं भूयादेष धर्मः सनातनः — हिन्दी अनुवाद एवं प्रश्नोत्तर
अभ्यासाद् जायते सिद्धिः — प्रश्नोत्तर
१. एकपदेन उत्तराणि
| क्र. | प्रश्न | उत्तर |
|---|---|---|
| (क) | भीमस्य जननी का? | कुन्ती |
| (ख) | कुन्त्या निश्चितं कः न समर्थयति? | युधिष्ठिरः |
| (ग) | पाण्डवानाम् उपकर्ता कः? | ब्राह्मणः (प्रतिवेशी विप्रः) |
| (घ) | कं चिन्तयन् दुर्योधनः निद्रां न लभते? | भीमम् |
| (ङ) | पाण्डवाः कुत्र निवसन्ति स्म? | एकचक्रनगरे (ब्राह्मणगृहे) |
| (च) | भरतवंशप्रदीपः कः? | भीमः |
| (छ) | कः भृशं परिदेवयते? | ब्राह्मणः (तपस्वी विप्रः) |
२. पूर्णवाक्येन उत्तराणि
(क) “भैक्षप्रदानेन…” इति श्लोकानुसारं सनातनः धर्मः कः? कृतस्य उपकारस्य प्रत्युपकारः भवेत्, एष एव सनातनः धर्मः।
(हिन्दी: किए गए उपकार का प्रत्युपकार होना ही सनातन धर्म है।)
(ख) बकनामा दैत्यः कुत्र वसति? बकनामा दैत्यः एकचक्रनगरस्य पुरस्य अदूरवर्तिनि पर्वते वसति।
(हिन्दी: बक नामक दैत्य एकचक्रनगर के निकट स्थित पर्वत पर रहता है।)
(ग) कुन्ती किं प्रतिश्रुतवती? कुन्ती प्रतिश्रुतवती यत् स्वपुत्रेषु एकं बकासुरस्य समीपं प्रेषयिष्यामि इति।
(हिन्दी: कुंती ने प्रतिज्ञा की थी कि अपने पुत्रों में से एक को बकासुर के पास भेजूँगी।)
(घ) भीमस्य अग्रजः कः? युधिष्ठिरः।
(हिन्दी: भीम के बड़े भाई युधिष्ठिर हैं।)
(ङ) का प्रत्यादेशं न अर्हति? मातुः आज्ञा प्रत्यादेशं न अर्हति।
(हिन्दी: माता की आज्ञा का उल्लंघन नहीं किया जाना चाहिए।)
(च) पौराः बकासुराय कथं बलिम् आहरन्ति? पौराः पर्यायक्रमेण प्रतिदिनं भक्ष्यभोज्यादिकैः सह एकं मनुष्यं बकासुराय प्रेषयन्ति।
(हिन्दी: नगरवासी बारी-बारी से प्रतिदिन भोजन-सामग्री के साथ एक मनुष्य को बकासुर के पास भेजते हैं।)
(छ) क्षत्रियाणां धर्मः कः? नररक्षणं क्षत्रियाणां धर्मः।
(हिन्दी: मनुष्यों की रक्षा करना क्षत्रियों का धर्म है।)
३. के न कं प्रति उक्तानि
| क्र. | वाक्यम् | केन/कया | कं/कां प्रति |
|---|---|---|---|
| यथा | तस्माद् बालकस्य पिता तपस्वी शोचति | कुन्त्या | भीमम् |
| १ | न हि मातुराज्ञा प्रत्यादेशमर्हति | भीमेन | युधिष्ठिरं प्रति |
| २ | न हि खरदंष्ट्रो मृगाधिपः सहायमपेक्षते | भीमेन | अर्जुनं प्रति |
| ३ | क्षत्रियाण्या यदुचितं तदनुष्ठितम् | भीमेन | कुन्तीं प्रति |
| ४ | अपि हस्तद्वयेन भोक्ष्यसे | सहदेवेन | भीमं प्रति |
| ५ | तस्य भीमस्य प्रेषणं कथं नु त्वया सङ्कल्पितम् | युधिष्ठिरेण | कुन्तीं प्रति |
| ६ | नरभक्षणं नाम मांसाशिनां राक्षसानां धर्मः | बकेन | भीमं प्रति |
४. सन्धिविच्छेदः एवं सन्धिनाम
| पद | सन्धि-विच्छेद | सन्धिनाम |
|---|---|---|
| यथा — चैतावत् | च + एतावत् | वृद्धि सन्धिः |
| (क) सम्यगनुष्ठितम् | सम्यक् + अनुष्ठितम् | जश्त्व सन्धिः (व्यंजन सन्धि) |
| (ख) पुरस्यादूरवर्तिनि | पुरस्य + अदूरवर्तिनि | दीर्घ सन्धिः |
| (ग) दुरात्मनो वृत्तम् | दुरात्मनः + वृत्तम् | विसर्ग सन्धिः (उत्व) |
| (घ) मानुषोऽपि | मानुषः + अपि | विसर्ग सन्धिः |
| (ङ) नास्त्यत्र | न + अस्ति + अत्र | यण् सन्धिः |
| (च) यदुचितं / तदनुष्ठितम् | यत् + उचितम् / तत् + अनुष्ठितम् | जश्त्व सन्धिः |
| (छ) खल्वेकपुत्रः | खलु + एक(पुत्रः) | यण् सन्धिः |
| (ज) सङ्कल्पितम् | सम् + कल्पितम् | अनुस्वार सन्धिः |
| (झ) धर्मसङ्ग्रहोऽत्र | धर्मसङ्ग्रहः + अत्र | विसर्ग सन्धिः |
| (ञ) राक्षस इति | राक्षसः + इति | विसर्ग सन्धिः |
५. पर्यायवाची-पद मेलन
| पद | पर्याय |
|---|---|
| आयोधनम् | ५. युद्धम् |
| विप्रः | १. ब्राह्मणः |
| असुरः | ४. दैत्यः |
| अम्ब | २. जननी |
| हुताशनः | ३. अग्निः |
६. विपरीतार्थक शब्द
| पद | विपरीतार्थक |
|---|---|
| यथा — पीवरः | कृशः |
| (क) उपकृतः | अपकृतः |
| (ख) अग्रजस्य | अनुजस्य |
| (ग) उचितम् | अनुचितम् |
| (घ) हर्षः | शोकः / विषादः |
७. मञ्जूषातः विशेषणपद-चयन
(मंजूषा — क्षत्रियाणी, शकटपूरं, प्रतिवेशी, खरदंष्ट्रः, जठरस्थः, कौन्तेयः, पीवरौ)
| क्र. | उत्तर |
|---|---|
| यथा | पीवरौ बाहू |
| (क) | शकटपूरं मृष्टान्नम् |
| (ख) | प्रतिवेशी ब्राह्मणः |
| (ग) | खरदंष्ट्रः मृगाधिपः |
| (घ) | कौन्तेयः भीमः |
| (ङ) | क्षत्रियाणी कुन्ती |
| (च) | जठरस्थः हुताशनः |
८. समस्तपदानि
| वाक्यम् | समस्तपदम् |
|---|---|
| यथा — मृष्टम् अन्नम् | मृष्टान्नम् |
| (क) वीरस्य भुजयोः बलम् | भुजबलम् |
| (ख) धर्माणां सङ्ग्रहः | धर्मसङ्ग्रहः |
| (ग) मातुः आज्ञा | मातुराज्ञा |
| (घ) धनुः धरति इति | धनुर्धरः |
| (ङ) मृगाणाम् अधिपः | मृगाधिपः |
| (च) पुरस्य न दूरे | पुरस्यादूरे (अदूरवर्ति) |
९. उचितभावैः सह सम्मेलनम्
| वाक्यम् | भावः |
|---|---|
| यथा — प्रभूतमुपस्थितं मे भोजनम् | हर्षः |
| (क) धनुर्धरोऽहमनुगमिष्यामि | अधिकारः |
| (ख) भीमस्य प्रेषणं कथं नु त्वया सङ्कल्पितम्? | निराशा |
| (ग) अपि हस्तद्वयेन भोक्ष्यसे? | हासः |
| (घ) हनिष्यामि तं दुरात्मानम् | ओजः |
| (ङ) स खल्वेकपुत्रस्तपस्वी भृशं परिदेवयते | ग्लानिः |
| (च) मानुषापसद, परिवेषय मे भोजनम् | धैर्यम् |
(नोट: यह भाव-मेलन कुछ अंशों में व्याख्या-सापेक्ष है; ऊपर दिया गया मिलान सर्वाधिक उपयुक्त प्रतीत होता है।)
१०. वाच्यपरिवर्तनम् (कर्तृवाच्य → कर्मवाच्य)
| कर्तृवाच्यम् | कर्मवाच्यम् |
|---|---|
| यथा — भवत्या प्रतिश्रुतम् | भवती प्रतिश्रुतवती |
| (क) क्षत्रियाण्या अनुष्ठितम् | क्षत्रियाणी अनुष्ठितवती |
| (ख) भवत्या सज्जीक्रियताम् | भवती सज्जीकरोतु |
| (ग) भवत्या उपक्षिप्तम् | भवती उपक्षिप्तवती |
| (घ) त्वया सङ्कल्पितम् | त्वं सङ्कल्पितवान् |
| (ङ) भवता धर्मसङ्ग्रहः द्रष्टव्यः | भवान् धर्मसङ्ग्रहं पश्यतु |
| (च) पौरजनैः मानुषः प्रेषयितव्यः | पौरजनाः मानुषं प्रेषयन्तु |
नोट: सन्धि-विच्छेद, समास एवं वाच्य-परिवर्तन के कुछ उत्तर व्याकरणिक दृष्टि से एकाधिक रूपों में सही हो सकते हैं; ऊपर दिए गए उत्तर पाठ्यपुस्तक की मूल भावना के अनुरूप हैं। शिक्षक/पाठ्यपुस्तक की आधिकारिक उत्तर-कुंजी से मिलान अवश्य करें।



