षष्ठः पाठः — मनःपूतं समाचरेत्
(कक्षा ९, शारदा — पूर्ण हिन्दी अनुवाद तथा अभ्यास प्रश्नोत्तर)
भाग १ : संवाद (नाटिका-अंश) का हिन्दी अनुवाद
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📞 सम्पर्क करें: 8290601516संस्कृत: प्रियच्छात्राः! वदन्तु, किमपि कार्यं करणीयम् अस्ति चेत् आदौ किम् आवश्यकम्?
हिन्दी: प्रिय छात्रो! बताओ, यदि कोई भी कार्य करना हो तो सबसे पहले क्या आवश्यक है?
छात्र १: आचार्ये! विचिन्त्य कार्यकरणम्।
हिन्दी: आचार्य! सोच-विचार कर कार्य करना चाहिए।
छात्र २: उचितविधिना कार्यकरणम्।
हिन्दी: उचित विधि (सही तरीके) से कार्य करना चाहिए।
छात्र ३: पूर्णमनसा कार्यकरणम्।
हिन्दी: पूरे मन से कार्य करना चाहिए।
अध्यापिका: सर्वे उचितमेव वदन्ति। अधुना विचारयन्तु, यदि मनः एव मलिनं स्यात्, उद्देश्यम् एव अनुचितं स्यात् तर्हि किमपि कार्यं सम्यक् कथं भवेत्?
हिन्दी: आप सभी ठीक ही कह रहे हैं। अब सोचो, यदि मन ही मैला हो, उद्देश्य ही अनुचित हो, तो कोई भी कार्य सही ढंग से कैसे हो सकता है?
छात्र: एवं चेत् तस्य कार्यस्य फलम् अपि दूषितम् एव स्यात्।
हिन्दी: ऐसा होने पर तो उस कार्य का फल भी दूषित (खराब) ही होगा।
अध्यापिका: अत एव अस्माभिः सर्वाणि कार्याणि पवित्रेण मनसा करणीयानि। एतदेव शिक्षयति प्रस्तुतः पाठः ‘मनःपूतं समाचरेत्’ इति।
हिन्दी: इसीलिए हमें सभी कार्य पवित्र मन से करने चाहिए। यही बात यह पाठ ‘मनःपूतं समाचरेत्’ (मन से पवित्र किया हुआ आचरण करना चाहिए) सिखाता है।
छात्रा: आचार्ये! अस्मिन् पाठे विविधेभ्यः ग्रन्थेभ्यः सुभाषितानि सङ्कलितानि दृश्यन्ते। किम् एतानि सुभाषितानि वर्तमानसमये अपि उपयोगीनि सन्ति?
हिन्दी: आचार्य! इस पाठ में विभिन्न ग्रन्थों से सुभाषित (अच्छी उक्तियाँ) संकलित दिखाई देते हैं। क्या ये सुभाषित आज के समय में भी उपयोगी हैं?
अध्यापिका: भवन्तः स्वयमेव चिन्तयन्तु।
हिन्दी: आप स्वयं ही सोचिए (विचार कीजिए)।
छात्रा: अहं वदामि आचार्ये! एतानि सुभाषितानि न केवलं पठनाय अपितु जीवने आचरणाय सन्ति।
हिन्दी: मैं कहती हूँ, आचार्य! ये सुभाषित केवल पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि जीवन में आचरण करने (अपनाने) के लिए हैं।
अध्यापिका: सम्यक् उक्तम्। आयान्तु, वयं सुभाषितानि पठामः जीवने च आचरामः।
हिन्दी: ठीक कहा। आओ, हम सुभाषितों को पढ़ें और जीवन में उनका आचरण भी करें।
भाग २ : आठों श्लोकों का हिन्दी अनुवाद (अर्थ सहित)
श्लोक १ (मनुस्मृतिः — ६.४६)
दृष्टिपूतं न्यसेत् पादं वस्त्रपूतं जलं पिबेत्। सत्यपूतां वदेत् वाचं मनः पूतं समाचरेत्॥
हिन्दी अर्थ: दृष्टि से (देखकर) शुद्ध किया हुआ पैर रखे, वस्त्र से छाना हुआ जल पिए, सत्य से शुद्ध वाणी बोले और मन से पवित्र किया हुआ आचरण करे।
श्लोक २ (मनुस्मृतिः — ६.९२)
धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः। धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्॥
हिन्दी अर्थ: धैर्य, क्षमा, मन-इन्द्रियों को वश में रखना, चोरी न करना, पवित्रता, इन्द्रिय-निग्रह, बुद्धि, विद्या, सत्य और क्रोध न करना — ये दस धर्म के लक्षण हैं।
श्लोक ३ (श्रीमद्भगवद्गीता — ३.२१)
यद्यदाचरति श्रेष्ठः तत्तदेवेतरो जनः। स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥
हिन्दी अर्थ: श्रेष्ठ (बड़ा) व्यक्ति जो-जो आचरण करता है, अन्य लोग भी वैसा ही आचरण करते हैं। वह जिस बात को प्रमाण (आदर्श) मानकर करता है, संसार भी उसी का अनुसरण करता है।
श्लोक ४ (सुभाषितरत्नभाण्डागारः)
अभ्यासेन क्रियाः सर्वाः अभ्यासात् सकलाः कलाः। अभ्यासाद् ध्यानमौनादि किमभ्यासस्य दुष्करम्॥
हिन्दी अर्थ: सभी क्रियाएँ अभ्यास से सिद्ध होती हैं, सभी कलाएँ अभ्यास से सिद्ध होती हैं। ध्यान, मौन आदि भी अभ्यास से ही सिद्ध होते हैं। अभ्यास के लिए भला क्या कठिन है? (अर्थात् निरंतर अभ्यास से सब कुछ प्राप्त किया जा सकता है)
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📞 सम्पर्क करें: 8290601516श्लोक ५ (नीतिशतकम् — २७)
प्रारभ्यते न खलु विघ्नभयेन नीचैः प्रारभ्य विघ्नविहता विरमन्ति मध्याः। विघ्नैः पुनः पुनरपि प्रतिहन्यमानाः प्रारभ्य चोत्तमजनाः न परित्यजन्ति॥
हिन्दी अर्थ: निम्न (कमज़ोर सोच वाले) लोग विघ्नों के भय से कार्य आरंभ ही नहीं करते। मध्यम श्रेणी के लोग कार्य आरंभ करके विघ्न आने पर उसे बीच में छोड़ देते हैं। परन्तु उत्तम (श्रेष्ठ) लोग कार्य आरंभ करने के बाद बार-बार विघ्नों से रुकावट आने पर भी उसे नहीं छोड़ते।
श्लोक ६ (पञ्चतन्त्रम् — मित्रभेदः — १४९)
उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीः दैवेन देयमिति कापुरुषा वदन्ति। दैवं निहत्य कुरु पौरुषमात्मशक्त्या यत्ने कृते यदि न सिध्यति कोऽत्र दोषः॥
हिन्दी अर्थ: पुरुषों में सिंह के समान उद्योगी (परिश्रमी) व्यक्ति के पास लक्ष्मी स्वयं आती है। “यह तो भाग्य से ही मिलती है” — ऐसा कायर लोग कहते हैं। भाग्य को लांघकर अपनी शक्ति से पुरुषार्थ करो। प्रयत्न करने पर भी यदि सफलता न मिले तो उसमें क्या दोष है? (अर्थात् प्रयत्न करना ही मनुष्य का कर्तव्य है, परिणाम की चिंता नहीं करनी चाहिए)
श्लोक ७ (मालविकाग्निमित्रम् — १.२)
पुराणमित्येव न साधु सर्वं न चापि काव्यं नवमित्यवद्यम्। सन्तः परीक्ष्यान्यतरद्भजन्ते मूढः परप्रत्ययनेयबुद्धिः॥
हिन्दी अर्थ: पुराना है इसलिए ही सब कुछ अच्छा नहीं होता, और नया है इसलिए ही काव्य निम्नस्तरीय (बुरा) भी नहीं होता। सज्जन लोग परीक्षा (जाँच-परख) करके इन दोनों में से किसी एक को स्वीकार करते हैं। मूर्ख व्यक्ति की बुद्धि दूसरों के कहने से ही चलती है (अर्थात् वह स्वयं विचार नहीं करता, दूसरों की बात मानकर ही निर्णय लेता है)।
श्लोक ८ (किरातार्जुनीयम् — २.३०)
सहसा विदधीत न क्रियामविवेकः परमापदां पदम्। वृणते हि विमृश्यकारिणं गुणलुब्धाः स्वयमेव सम्पदः॥
हिन्दी अर्थ: बिना सोचे-समझे अचानक कोई भी कार्य नहीं करना चाहिए, क्योंकि बिना विचारे कार्य करना (अविवेक) सबसे बड़े संकटों का कारण होता है। अच्छे गुणों को चाहने वाली सम्पत्तियाँ स्वयं ही सोच-समझकर कार्य करने वाले व्यक्ति को चुन लेती हैं (उसी के पास आती हैं)।
Class 9th Sanskrit Chapter 5 Hindi Translation
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